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लाहौर से पटियाला तक, साझा कक्षा की विरासत आज भी जीवित

विभाजन के बाद लाहौर के ऐचिसन कॉलेज की परंपरा पटियाला के यादविंद्र पब्लिक स्कूल में आगे बढ़ी, जो आज भी भारत-पाक की साझा शैक्षिक विरासत को जीवित रखे हुए है।

कभी औपनिवेशिक भारत के दौर में, अविभाजित पंजाब में स्थित प्रतिष्ठित ऐचिसन कॉलेज, लाहौर की कक्षाओं में बैठकर पढ़ने वाले छात्र जीवनभर की यादें संजोते थे। यह उस समय के गिने-चुने नामी पब्लिक स्कूलों में से एक था, जहां शिक्षा के साथ-साथ अनुशासन और नेतृत्व के संस्कार भी दिए जाते थे।

लेकिन वर्ष 1947 का विभाजन केवल भूगोल तक सीमित नहीं रहा, उसने कक्षाओं और शिक्षा संस्थानों को भी गहराई से प्रभावित किया। भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के दौरान हजारों छात्रों को मजबूरन एक देश से दूसरे देश में पलायन करना पड़ा। इसी ऐतिहासिक उथल-पुथल के बीच लाहौर का ऐचिसन कॉलेज भारत में एक तरह से दोबारा जीवित हुआ।

1948 में पटियाला में यादविंद्र पब्लिक स्कूल (वाईपीएस) की स्थापना हुई। इस स्कूल की नींव पटियाला रियासत के अंतिम शासक महाराजा यादविंद्र सिंह ने रखी। उनका उद्देश्य भारत में उसी तर्ज पर एक विद्यालय स्थापित करना था, जैसा ऐचिसन कॉलेज लाहौर था, जहां उन्होंने स्वयं और उनके पिता महाराजा भूपिंदर सिंह ने शिक्षा प्राप्त की थी। दोनों ही ऐचिसन कॉलेज के पूर्व छात्र थे।

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वाईपीएस पटियाला ने विभाजन के बाद ऐचिसन कॉलेज के एक विकल्प के रूप में काम किया। कई ऐसे छात्र, जिन्हें अचानक लाहौर छोड़ना पड़ा था, उन्होंने अपनी पढ़ाई पटियाला के इस नए विद्यालय में जारी रखी। इस तरह, शिक्षा की एक साझा परंपरा और विरासत ने नई सीमाओं के बावजूद अपनी निरंतरता बनाए रखी।

आज, ऐचिसन कॉलेज लाहौर अपने 140 वर्ष और यादविंद्र पब्लिक स्कूल पटियाला अपने 78 वर्ष पूरे कर रहे हैं। दोनों संस्थान अपनी साझा विरासत और “ओल्ड बॉयज़” की उपलब्धियों का उत्सव मनाने की तैयारी कर रहे हैं, जो यह दर्शाता है कि इतिहास और शिक्षा की डोर सीमाओं से परे भी जुड़ी रह सकती है।

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