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म्यांमार में स्वतंत्रता दिवस पर आम माफी, चुनावी प्रक्रिया के बीच 6,186 कैदियों की रिहाई का ऐलान

म्यांमार की सैन्य सरकार ने स्वतंत्रता दिवस पर चुनावी प्रक्रिया के बीच 6,186 कैदियों को रिहा करने की घोषणा की है, हालांकि राजनीतिक बंदियों की रिहाई को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है।

म्यांमार की सैन्य सरकार ने स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आम माफी के तहत 6,186 कैदियों को रिहा करने का फैसला किया है। सरकारी मीडिया ने शनिवार (3 जनवरी 2026) को यह जानकारी दी। यह घोषणा ऐसे समय में की गई है जब देश में बहु-चरणीय आम चुनाव प्रक्रिया शुरू हुए एक सप्ताह हो चुका है। दक्षिण-पूर्व एशिया के इस गरीब देश में चुनाव पहले ही विवादों में घिरे हुए हैं।

The Indian Witness के अनुसार, इस आम माफी में 52 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। सरकार ने इसे एक मानवीय कदम बताया है, जिसे जनता के मानसिक सुकून और सामाजिक शांति को ध्यान में रखते हुए उठाया गया है। इसके अलावा, देशभर में कैदियों की सजा में एक-छठा हिस्सा घटाने का भी निर्णय लिया गया है। हालांकि, यह राहत हत्या, बलात्कार, आतंकवाद, भ्रष्टाचार तथा हथियार या मादक पदार्थों से जुड़े गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए लोगों पर लागू नहीं होगी।

फिलहाल यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि इस आम माफी के तहत किसी राजनीतिक बंदी को रिहा किया जाएगा या नहीं। वर्ष 2021 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद से म्यांमार लगातार अशांति की चपेट में है। सेना ने नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची की निर्वाचित नागरिक सरकार को अपदस्थ कर दिया था और लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शनों को हिंसक तरीके से कुचल दिया था, जिसके बाद पूरे देश में सशस्त्र विद्रोह भड़क उठा।

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आंग सान सू ची को तख्तापलट के बाद गिरफ्तार किया गया और उन्हें 27 साल की सजा सुनाई गई है। उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने 2020 के चुनावों में भारी जीत हासिल की थी, लेकिन बाद में उसे भंग कर दिया गया। मानवाधिकार संगठन ‘असिस्टेंस एसोसिएशन फॉर पॉलिटिकल प्रिजनर्स’ के अनुसार, तख्तापलट के बाद से अब तक 30,000 से अधिक लोगों को राजनीतिक आरोपों में हिरासत में लिया गया है।

इस बीच, नए प्रतिरोधी समूह और पुराने जातीय सशस्त्र संगठन सेना के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, जिससे करीब 36 लाख लोग अपने घर छोड़ने को मजबूर हुए हैं। पिछले सप्ताह हुए चुनावों के पहले चरण को विपक्षी दलों, संयुक्त राष्ट्र और कुछ पश्चिमी देशों ने ‘दिखावटी’ करार दिया है, क्योंकि सैन्य शासन विरोधी दलों को चुनाव से बाहर रखा गया है और मतदान की आलोचना करना भी गैरकानूनी है।

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