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म्यांमार में सैन्य शासन के तहत चुनाव का दूसरा चरण शुरू, कम मतदान पर उठे सवाल

म्यांमार में सैन्य शासन के तहत चुनाव के दूसरे चरण में मतदान हुआ, लेकिन कम मतदान, विपक्ष की गैरमौजूदगी और हिंसा के बीच इन चुनावों की विश्वसनीयता पर अंतरराष्ट्रीय सवाल उठ रहे हैं।

गृहयुद्ध से जूझ रहे म्यांमार में रविवार, 11 जनवरी 2026 को सैन्य शासन के तहत कराए जा रहे चुनाव के दूसरे चरण के लिए मतदाता कतारों में नजर आए। इससे पहले 28 दिसंबर 2025 को हुए पहले चरण में बेहद कम मतदान दर्ज किया गया था, जिसके चलते इन चुनावों को सैन्य शासन को वैधता देने का प्रयास बताया जा रहा है।

म्यांमार में 2021 में सेना द्वारा निर्वाचित नागरिक सरकार को हटाने और नोबेल शांति पुरस्कार विजेता आंग सान सू ची को हिरासत में लेने के बाद से देश हिंसक संघर्ष की चपेट में है। इस तख्तापलट के बाद शुरू हुए गृहयुद्ध ने 5.1 करोड़ आबादी वाले इस गरीब देश के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया है।

आंग सान सू ची की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी), जिसने 2020 का चुनाव भारी बहुमत से जीता था, को दर्जनों अन्य सैन्य-विरोधी दलों के साथ भंग कर दिया गया है। इन दलों पर आरोप है कि उन्होंने नए चुनावों के लिए पंजीकरण नहीं कराया। वहीं, विद्रोही समूहों ने भी चुनाव में भाग लेने से इनकार कर दिया है।

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संयुक्त राष्ट्र, कई पश्चिमी देशों और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह चुनाव न तो स्वतंत्र है, न निष्पक्ष और न ही विश्वसनीय, क्योंकि इसमें किसी सार्थक विपक्ष की मौजूदगी नहीं है।

सेना समर्थित यूनियन सॉलिडैरिटी एंड डेवलपमेंट पार्टी (USDP) पहले चरण में भारी बढ़त बनाए हुए है। पार्टी ने निचले सदन की 102 में से 90 सीटें जीत ली हैं। पहले चरण में मतदान प्रतिशत सिर्फ 52.13% रहा, जो 2020 और 2015 के चुनावों से काफी कम है।

क्राइसिस ग्रुप के वरिष्ठ सलाहकार रिचर्ड हॉर्सी ने कहा कि USDP की बड़ी जीत कोई आश्चर्य नहीं है, क्योंकि विपक्षी दलों को हटाकर और सख्त कानूनों के जरिए मैदान पूरी तरह उसके पक्ष में झुका दिया गया है।

चुनाव का अंतिम चरण 25 जनवरी को होगा। कुल मिलाकर 330 में से 265 टाउनशिप में मतदान कराया जाएगा, जिनमें वे इलाके भी शामिल हैं जहां सेना का पूर्ण नियंत्रण नहीं है।

सैन्य शासन का दावा है कि ये चुनाव देश में राजनीतिक स्थिरता और बेहतर भविष्य लाएंगे। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि जारी संघर्ष के बीच किसी भी सैन्य-नियंत्रित सरकार को व्यापक अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलना मुश्किल है। तख्तापलट के बाद से अब तक कम से कम 16,600 नागरिकों की मौत हो चुकी है और 36 लाख लोग विस्थापित हुए हैं।

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