दिव्यांग सरकारी कर्मचारियों के प्रमाणपत्रों की पुनः जांच से जुड़े मानवाधिकार उल्लंघनों पर एनएचआरसी की चिंता
एनएचआरसी ने कहा कि दिव्यांग सरकारी कर्मचारियों के प्रमाणपत्रों की सामूहिक पुनः जांच मानवाधिकार उल्लंघन है। केवल संदेह वाले मामलों में ही जांच होनी चाहिए।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) ने दिव्यांग सरकारी कर्मचारियों के प्रमाणपत्रों की पुनः जांच या पुनर्मूल्यांकन से उत्पन्न हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों पर गंभीर चिंता जताई है। एनएचआरसी के अध्यक्ष, न्यायमूर्ति वी. रामसुब्रमण्यम (सेवानिवृत्त) ने बुधवार (28 जनवरी, 2026) को कहा कि दिव्यांग कर्मचारियों के सभी मामलों में सामूहिक रूप से पुनः सत्यापन करना उचित नहीं है।
उन्होंने स्पष्ट रूप से सिफारिश की कि केवल उन्हीं मामलों में जांच या पुनः सत्यापन किया जाना चाहिए, जहां किसी विशेष प्रकार का संदेह हो। बिना ठोस कारण के सभी दिव्यांग कर्मचारियों के प्रमाणपत्रों की सामूहिक जांच न केवल अनावश्यक है, बल्कि इससे उनके सम्मान, गरिमा और अधिकारों का भी उल्लंघन हो सकता है।
यह टिप्पणी एनएचआरसी की कोर ग्रुप बैठक के दौरान आई, जो केंद्र सरकार द्वारा सरकारी नौकरियों और शिक्षा संस्थानों में दिव्यांगता प्रमाणपत्रों के सत्यापन को लेकर जारी एक परामर्श (एडवाइजरी) के बाद आयोजित की गई थी। बैठक में इस बात पर विस्तार से चर्चा हुई कि बार-बार या अनावश्यक पुनः जांच से दिव्यांग कर्मचारियों को मानसिक तनाव, सामाजिक असहजता और प्रशासनिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
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न्यायमूर्ति रामसुब्रमण्यम ने कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों को पहले ही कई सामाजिक और संरचनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में, उनकी सेवाओं और शैक्षणिक अधिकारों से जुड़े मामलों में संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि सरकार का उद्देश्य धोखाधड़ी रोकना हो सकता है, लेकिन इसके लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया न्यायसंगत, सीमित और अधिकार-सम्मत होनी चाहिए।
एनएचआरसी ने यह भी कहा कि दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा करना संविधान और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप है। आयोग ने केंद्र और राज्य सरकारों से अपील की कि वे ऐसी नीतियां बनाएं, जो पारदर्शी होने के साथ-साथ दिव्यांग कर्मचारियों की गरिमा और मानवाधिकारों की पूरी तरह रक्षा करें।
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