पेरियार विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पर डीएमके कार्यक्रम में शामिल होने को लेकर कार्रवाई की मांग
पेरियार विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के डीएमके के एक कार्यक्रम में भाग लेने को लेकर उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की मांग उठी है।
पेरियार विश्वविद्यालय से जुड़े एक प्रोफेसर के द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (डीएमके) के एक कार्यक्रम में शामिल होने के मामले ने विवाद का रूप ले लिया है। इस घटना को लेकर संबंधित प्रोफेसर के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की गई है।
आरोप है कि एक सरकारी विश्वविद्यालय से संबद्ध शिक्षक का किसी राजनीतिक दल के आयोजन में सार्वजनिक रूप से भाग लेना शैक्षणिक संस्थानों की तटस्थता और आचार संहिता के विपरीत है। इसी आधार पर यह मांग सामने आई है कि प्रोफेसर के खिलाफ उपयुक्त अनुशासनात्मक कदम उठाए जाएं।
पेरियार विश्वविद्यालय तमिलनाडु के प्रमुख शैक्षणिक संस्थानों में गिना जाता है और राज्य में शिक्षा के क्षेत्र में इसकी अहम भूमिका रही है। ऐसे में विश्वविद्यालय से जुड़े किसी शिक्षक के सीधे तौर पर किसी राजनीतिक दल के कार्यक्रम से जुड़ने का मामला सामने आने के बाद शैक्षणिक हलकों में इस पर चर्चा शुरू हो गई है।
और पढ़ें: भूपेंद्र यादव जैव विविधता पर भारत की उपलब्धियां प्रस्तुत करने आर्मेनिया पहुंचे
डीएमके तमिलनाडु की पार्टी है और राज्य की राजनीति में उसका महत्वपूर्ण प्रभाव है। पार्टी के कार्यक्रमों में अक्सर विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोग शामिल होते रहे हैं, लेकिन सरकारी शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों की राजनीतिक गतिविधियों में भागीदारी को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
फिलहाल इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है। यह स्पष्ट नहीं है कि प्रोफेसर के खिलाफ अब तक कोई औपचारिक जांच या कार्रवाई शुरू की गई है या नहीं। मामले को लेकर अलग-अलग पक्षों की प्रतिक्रियाएं आना अभी बाकी है।
शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि सरकारी विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को राजनीतिक गतिविधियों से दूरी बनाए रखनी चाहिए, ताकि संस्थान की निष्पक्षता पर कोई प्रश्नचिह्न न लगे। वहीं कुछ लोगों का यह भी तर्क है कि एक नागरिक के रूप में किसी भी व्यक्ति को अपनी राजनीतिक पसंद व्यक्त करने और सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग लेने का अधिकार है।
यह मामला आने वाले दिनों में और तूल पकड़ सकता है, क्योंकि शैक्षणिक संस्थानों में राजनीतिक गतिविधियों को लेकर पहले भी इस तरह के विवाद सामने आते रहे हैं। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से इस संबंध में आगे क्या रुख अपनाया जाता है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हैं। फिलहाल प्रोफेसर की पहचान और कार्यक्रम का पूर्ण विवरण अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हो पाया है।