मूल अपराध में मिली राहत से पीएमएलए मामले में स्वतः सुरक्षा नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि मूल अपराध की एफआईआर में मिली गिरफ्तारी से सुरक्षा पीएमएलए मामले में स्वतः लागू नहीं होती। दोनों मामलों की कानूनी प्रकृति अलग है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति को मूल अपराध यानी प्रेडिकेट ऑफेंस की एफआईआर में मिली गिरफ्तारी से सुरक्षा का लाभ अपने आप धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत दर्ज मामले में नहीं मिल सकता।
अदालत ने यह टिप्पणी एक कारोबारी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए की। कारोबारी के खिलाफ पीएमएलए के तहत मामला चल रहा था और उसने मूल अपराध में मिली सुरक्षा के आधार पर पीएमएलए मामले में भी गिरफ्तारी से संरक्षण की मांग की थी।
न्यायमूर्ति मधु जैन ने कहा कि केवल इस आधार पर याचिकाकर्ता मौजूदा कार्यवाही में गिरफ्तारी से पहले की सुरक्षा का दावा नहीं कर सकता कि उसे मूल अपराध में ऐसी सुरक्षा प्रदान की गई है।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि मूल अपराध और पीएमएलए के तहत होने वाली कार्यवाही अलग और स्वतंत्र कानूनी प्रक्रियाएं हैं। इसलिए किसी एक मामले में अदालत द्वारा दी गई राहत को दूसरे मामले में स्वतः लागू नहीं माना जा सकता।
पीएमएलए के तहत धन शोधन से जुड़े मामलों की जांच प्रवर्तन निदेशालय द्वारा की जाती है। ऐसे मामलों में अक्सर किसी कथित आपराधिक गतिविधि से प्राप्त धन को वैध दिखाने या उसका इस्तेमाल करने के आरोपों की जांच की जाती है।
दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि यदि किसी आरोपी को उस अपराध में राहत मिल जाती है, जिसे पीएमएलए मामले का आधार बनाया गया है, तब भी उसे धन शोधन मामले में अलग से कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।
अदालत ने माना कि पीएमएलए के तहत दर्ज कार्यवाही को केवल इसलिए समाप्त या स्थगित नहीं किया जा सकता कि संबंधित व्यक्ति को मूल अपराध में गिरफ्तारी से संरक्षण प्राप्त है।
इस फैसले में हाईकोर्ट ने दोनों कानूनी कार्यवाहियों की स्वतंत्र प्रकृति पर जोर दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को पीएमएलए मामले में राहत हासिल करने के लिए अलग से अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखना होगा।
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