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पंजाब में पराली की सियासत: 2027 चुनाव से पहले कम आग, वही धुंध

पंजाब में पराली जलाने की घटनाएं तेजी से घटी हैं, लेकिन 2027 चुनाव से पहले नकद प्रोत्साहन, किसानों की कार्रवाई और प्रदूषण को लेकर केंद्र-राज्य राजनीतिक टकराव फिर बढ़ सकता है।

पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले पराली जलाने का मुद्दा फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ सकता है। हर साल सितंबर के अंत और अक्टूबर की शुरुआत के छह से आठ सप्ताह किसानों, प्रशासन और मीडिया के लिए बेहद व्यस्त रहते हैं। किसान रबी फसलों की बुवाई के लिए खेत खाली करते हैं, जबकि प्रशासन सैटेलाइट तस्वीरों के जरिए पराली जलाने की घटनाओं पर नजर रखता है।

राज्य में पराली जलाने के मामलों में पिछले वर्षों में बड़ी कमी दर्ज की गई है। आंकड़ों के अनुसार, 2023 में 36,663, 2024 में 10,909 और 2025 में 5,114 खेतों में आग लगने की घटनाएं दर्ज हुईं। 2023 के मुकाबले 2025 में करीब 86 प्रतिशत गिरावट रही। 2021 से 2025 के बीच घटनाओं में 92.83 प्रतिशत की कमी बताई गई है।

प्रशासन ने किसानों के खिलाफ एफआईआर, पर्यावरणीय जुर्माने और भूमि रिकॉर्ड में ‘रेड एंट्री’ जैसी कार्रवाई की है। हालांकि, किसान संगठन इन कदमों का विरोध करते हैं। उनका कहना है कि कम समय में कटाई, डीजल की बढ़ती लागत और पराली प्रबंधन वाली मशीनों का खर्च किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ डालता है। किसान संगठन प्रति एकड़ 2,000 से 3,000 रुपये तक नकद प्रोत्साहन की मांग करते रहे हैं।

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मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने भी केंद्र से किसानों को आर्थिक सहायता देने की मांग की है। पंजाब सरकार ने 2,500 रुपये प्रति एकड़ प्रोत्साहन का प्रस्ताव दिया था, जिसमें केंद्र और राज्य के हिस्से का सुझाव दिया गया था। केंद्र ने प्रत्यक्ष नकद भुगतान के बजाय मशीनों पर सब्सिडी को प्राथमिकता दी है।

पराली के धुएं को स्वास्थ्य और सड़क दुर्घटनाओं से भी जोड़ा गया है। विपक्षी दल सरकार की नीतियों पर सवाल उठा सकते हैं, जबकि आम आदमी पार्टी पराली जलाने में कमी को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर सकती है। बीजेपी केंद्र की मशीनरी सहायता का हवाला देते हुए पंजाब सरकार के क्रियान्वयन पर सवाल उठाती रही है।

इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी के पुराने बयानों को लेकर भी राजनीतिक बहस होती रही है। सत्ता और विपक्ष की भूमिका बदलने के साथ पराली पर उसके तर्कों में बदलाव के आरोप लगाए गए हैं।

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