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अरुणाचल के जंगलों में मिला दुर्लभ ‘घोस्ट फ्लावर’, बिना पत्तियों और क्लोरोफिल के जीवित रहता है यह ऑर्किड

अरुणाचल प्रदेश में वैज्ञानिकों ने दुर्लभ पत्तीविहीन ऑर्किड गैस्ट्रोडिया कीयेंसिस खोजा है। यह क्लोरोफिल के बिना मिट्टी की फफूंद से पोषण लेता है और बेहद सीमित क्षेत्र में पाया गया है।

अरुणाचल प्रदेश के घने और दुर्गम जंगलों में वैज्ञानिकों को वनस्पति विज्ञान की दुनिया में एक दुर्लभ खोज मिली है। वैज्ञानिकों ने कीई पान्योर जिले में कीई नदी के किनारे एक दुर्गम घाटी में पत्तीविहीन ऑर्किड की नई प्रजाति गैस्ट्रोडिया कीयेंसिस खोजी है। करीब 1,000 मीटर की ऊंचाई पर मिली यह प्रजाति न तो पत्तियां रखती है और न ही इसमें क्लोरोफिल होता है। पोषण के लिए यह मिट्टी में मौजूद फफूंद पर निर्भर रहती है।

वनस्पति सर्वेक्षण के दौरान शोधकर्ताओं को इसके सिर्फ पांच फूल वाले पौधे मिले। इसकी दुर्लभता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसका अधिकांश जीवन जंगल की जमीन के नीचे छिपा रहता है और फूल खिलने की अवधि भी बेहद कम होती है।

‘घोस्ट फ्लावर’ क्यों पड़ा नाम?

न्यीशी भाषा में इस ऑर्किड को ‘ओराम ओपुह’ कहा जाता है, जिसका अर्थ ‘घोस्ट फ्लावर’ यानी भूत फूल है। यह नाम इसके रहस्यमय स्वरूप और जीवनचक्र के कारण पड़ा है। पौधे का बड़ा हिस्सा जमीन के नीचे रहता है और अनुकूल परिस्थितियों में ही यह थोड़े समय के लिए फूल के रूप में सतह पर दिखाई देता है।

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गैस्ट्रोडिया वंश के ऑर्किड अपनी असामान्य जीवनशैली के लिए जाने जाते हैं। सामान्य पौधों की तरह ये प्रकाश संश्लेषण के जरिए भोजन नहीं बनाते। मिट्टी में मौजूद फफूंद के साथ इनके विशेष संबंध के जरिए इन्हें पोषक तत्व मिलते हैं। इस प्रक्रिया को होलोमाइकोट्रॉफी कहा जाता है।

बांस के झुरमुटों में मिली प्रजाति

अधिकारियों के मुताबिक, गैस्ट्रोडिया कीयेंसिस कीई नदी के दाहिने किनारे बांस के झुरमुटों में घनी छाया के बीच मोटी सड़ी हुई पत्तियों की परत में उगती मिली। पौधा करीब 35 सेंटीमीटर तक ऊंचा हो सकता है और इसमें एक से तीन फूल आते हैं।

इसके फूल सफेद से हल्के नीले रंग के होते हैं। फूल के लेबेलम का निचला हिस्सा चौड़ा और उल्टे अंडाकार आकार का है, जिस पर छह से सात प्रमुख लंबवत मोटी संरचनाएं हैं। इसका ऊपरी हिस्सा मोटा, पीला और काफी मुड़ा हुआ होता है। यही विशिष्ट संरचनाएं इसे संबंधित ऑर्किड प्रजातियों से अलग पहचान देती हैं।

अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन

नई प्रजाति का औपचारिक वैज्ञानिक विवरण अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण संबंधी पत्रिका फाइटोटैक्सा में प्रकाशित शोधपत्र में दिया गया है। शोधपत्र के लेखक मधुसूदन खनाल, दीपांकर बोरा, शुभदीप सरकार, नीलम गैप, संतोष कुमार राय और देवेंद्र कुमार हैं। अध्ययन में शामिल वैज्ञानिक जी.बी. पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण संस्थान, सिक्किम विश्वविद्यालय, कलियाबोर कॉलेज और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण जैसे संस्थानों से जुड़े हैं। शोधपत्र 9 सितंबर को प्रकाशित हुआ।

अरुणाचल प्रदेश के उपमुख्यमंत्री चौना मीन ने इस खोज को राज्य की प्राकृतिक विरासत में एक और महत्वपूर्ण जुड़ाव बताया। उन्होंने कहा कि ऑर्किड का सीमित ज्ञात वितरण और कम अवधि तक फूलना नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण और निरंतर शोध की जरूरत को रेखांकित करता है।

फिलहाल ‘डेटा डेफिशिएंट’ श्रेणी

शोधकर्ताओं के अनुसार, गैस्ट्रोडिया कीयेंसिस अभी केवल उसी स्थान पर ज्ञात है, जहां से इसका वैज्ञानिक नमूना मिला है। इसका अनुमानित क्षेत्रफल करीब चार वर्ग किलोमीटर है। वास्तविक आबादी और व्यापक वितरण की जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण इसे फिलहाल ‘डेटा डेफिशिएंट’ (DD) श्रेणी में रखा गया है।

वैज्ञानिकों ने प्रजाति की वास्तविक स्थिति समझने के लिए आगे व्यापक सर्वेक्षण और लंबे समय तक निगरानी की सिफारिश की है। यह खोज अरुणाचल प्रदेश की समृद्ध वनस्पति विविधता को भी सामने लाती है। राज्य के वन विभाग के अनुसार, यहां करीब 600 ऑर्किड प्रजातियां दर्ज की जा चुकी हैं। विविध ऊंचाई, जलवायु और वन आवासों के कारण अरुणाचल को लंबे समय से ‘ऑर्किड पैराडाइज’ के रूप में जाना जाता है।

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