जम्मू-कश्मीर में विभाजन की बहस की वापसी और इसके खतरनाक निहितार्थ
जम्मू-कश्मीर में फिर से विभाजन की बहस सामने आई है। 1950 में ओवेन डिक्सन की रिपोर्ट ने क्षेत्रीय बंटवारे का सुझाव दिया था, जिसे आज खतरनाक माना जा रहा है।
जम्मू-कश्मीर में एक बार फिर विभाजन की चर्चा उभर रही है, जो न केवल ऐतिहासिक रूप से संवेदनशील है बल्कि वर्तमान हालात में भी गंभीर और खतरनाक परिणाम ला सकती है। इस बहस की जड़ें वर्ष 1950 तक जाती हैं, जब 15 सितंबर 1950 को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) को जम्मू-कश्मीर पर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सौंपी गई थी। यह रिपोर्ट ऑस्ट्रेलिया के पूर्व मुख्य न्यायाधीश ओवेन डिक्सन द्वारा प्रस्तुत की गई थी, जिन्हें भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता के लिए नियुक्त किया गया था।
उस समय संयुक्त राष्ट्र का अस्थायी मुख्यालय न्यूयॉर्क के लेक सक्सेस में था। 64 वर्षीय ओवेन डिक्सन ने जम्मू-कश्मीर के दोनों हिस्सों का व्यापक दौरा किया, जिसमें वह क्षेत्र भी शामिल थे जो बाद में नियंत्रण रेखा (LoC) बने। उन्होंने नई दिल्ली और कराची के बीच कई दौर की बातचीत की और 20 जुलाई 1950 को भारतीय और पाकिस्तानी प्रधानमंत्रियों की एक बैठक कराने में भी भूमिका निभाई।
डिक्सन की सिफारिशों ने व्यावहारिक रूप से क्षेत्रीय विभाजन की सोच को फिर से जीवित कर दिया। उनके प्रस्ताव के अनुसार, हिंदू बहुल जम्मू के मैदानी इलाके भारत के पास रहने चाहिए, जबकि नियंत्रण रेखा के करीब स्थित सांस्कृतिक और भाषाई रूप से मुस्लिम बहुल राजौरी–पुंछ क्षेत्र पाकिस्तान को दिया जाना चाहिए। लद्दाख को भारत के साथ रखने की बात कही गई, जबकि गिलगित-बाल्टिस्तान और जिस क्षेत्र को बाद में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) कहा गया, उसे पाकिस्तान को सौंपने का सुझाव दिया गया।
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डिक्सन ने यह भी प्रस्ताव रखा कि केवल कश्मीर घाटी—जो मुस्लिम बहुल है लेकिन जिसकी अपनी विशिष्ट कश्मीरी पहचान है—में ही संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्रह कराया जाना चाहिए। हालांकि यह प्रस्ताव कभी लागू नहीं हुआ, लेकिन आज के दौर में इस तरह की विभाजनकारी सोच का फिर से उभरना क्षेत्र की शांति, एकता और स्थिरता के लिए गंभीर खतरा माना जा रहा है।