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स्वास्थ्य अधिकार कार्यकर्ताओं ने EU-भारत व्यापार समझौते का पूरा मसौदा सार्वजनिक करने की मांग की

स्वास्थ्य अधिकार समूहों ने EU-भारत एफटीए का पूरा मसौदा जारी करने की मांग की है, ताकि दवाओं के पेटेंट और सस्ती चिकित्सा पर संभावित प्रभाव स्पष्ट हो सकें।

स्वास्थ्य के अधिकार और सस्ती दवाओं तक पहुंच के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने यूरोपीय संघ (EU) और भारत के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के पूरे पाठ को सार्वजनिक करने की मांग की है। ‘वर्किंग ग्रुप ऑन एक्सेस टू मेडिसिन्स एंड ट्रीटमेंट’ ने कहा है कि हाल ही में EU-भारत एफटीए की वार्ताएं पूरी होने के बावजूद इसमें चिकित्सा उपचार और दवाओं से जुड़े पेटेंट प्रावधानों को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है।

समूह ने चिंता जताई कि समझौते में यह साफ नहीं किया गया है कि क्या इसमें पेटेंट अवधि बढ़ाने, दवाओं से जुड़े डेटा एक्सक्लूसिविटी या बाजार में दवाओं को विशेष अधिकार देने जैसे प्रावधान शामिल हैं या नहीं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस तरह की अस्पष्टता गंभीर चिंता का विषय है, क्योंकि इसका सीधा या परोक्ष असर आम लोगों की सस्ती और आवश्यक दवाओं तक पहुंच पर पड़ सकता है।

वर्किंग ग्रुप ने यह भी कहा कि भारत ने बौद्धिक संपदा (आईपी) संरक्षण और उसके प्रवर्तन से जुड़े ऐसे मानकों पर सहमति जताई है, जो विश्व व्यापार संगठन (WTO) के ट्रेड-रिलेटेड एस्पेक्ट्स ऑफ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (TRIPS) समझौते में निर्धारित न्यूनतम दायित्वों से आगे जाते हैं।

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समूह के अनुसार, जब वर्ष 2022 में EU-भारत एफटीए पर दोबारा बातचीत शुरू हुई थी, तब यूरोपीय संघ ने अपने प्रस्तावित आईपी मसौदे में दवा उत्पादों के लिए पेटेंट अवधि बढ़ाने और फार्मास्युटिकल डेटा एक्सक्लूसिविटी जैसे प्रावधानों को स्पष्ट रूप से शामिल करने की मांग की थी।

स्वास्थ्य अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि ऐसे प्रावधान लागू किए जाते हैं, तो इससे जेनेरिक दवाओं का उत्पादन और उपलब्धता प्रभावित हो सकती है, जिससे भारत और अन्य विकासशील देशों में दवाओं की कीमतें बढ़ने का खतरा है। इसी कारण उन्होंने पारदर्शिता की मांग करते हुए EU-भारत एफटीए के पूरे पाठ को सार्वजनिक करने की अपील की है, ताकि इसके संभावित प्रभावों पर सार्वजनिक बहस हो सके।

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