ज़िंदगी वैसी नहीं रही जैसी हो सकती थी: रोहित वेमुला की मौत के 10 साल बाद भी गम बरकरार
रोहित वेमुला की आत्महत्या के 10 साल बाद भी उनका परिवार और समर्थक जातिगत भेदभाव के खिलाफ न्याय की लड़ाई जारी रखे हुए हैं, जबकि उनकी याद आज भी सामाजिक सवाल खड़े करती है।
हैदराबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला कहती हैं, “रोहित के बिना ज़िंदगी सबसे ज़्यादा मुश्किल रही है, लेकिन हम तब से लगातार उसके लिए न्याय की लड़ाई लड़ रहे हैं।” 17 जनवरी 2016 को रोहित वेमुला ने हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर के एक हॉस्टल कमरे में आत्महत्या कर ली थी। उनकी मौत को अब 10 साल बीत चुके हैं, लेकिन परिवार, दोस्तों और समर्थकों के लिए यह पीड़ा आज भी उतनी ही गहरी है।
रोहित की मौत से कुछ सप्ताह पहले उन्हें हॉस्टल से निष्कासित कर दिया गया था। यह कार्रवाई अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एएसए) और आरएसएस से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के बीच हुए विवाद के बाद की गई थी। अपनी आत्महत्या से पहले लिखे गए पत्र में रोहित वेमुला ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ गहरा आक्रोश व्यक्त किया था। उन्होंने लिखा था, “मेरा जन्म ही मेरा घातक हादसा था,” जो देशभर में जाति आधारित असमानता पर बहस का प्रतीक बन गया।
रोहित की मृत्यु ने उनके परिवार और मित्रों के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। उनकी मां राधिका वेमुला और उनके छोटे बेटे राजा ने रोहित की मौत के कुछ महीनों बाद बौद्ध धर्म अपना लिया। राधिका वेमुला सामाजिक न्याय और समानता के मुद्दों पर लगातार आवाज उठाती रही हैं, हालांकि इस संघर्ष ने उनके स्वास्थ्य पर भी असर डाला है। हाल ही में उन्हें स्ट्रोक आया, जिसके बाद उनके दिल में स्टेंट डाला गया।
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दस साल बाद भी रोहित वेमुला की मौत केवल एक व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि देश के शैक्षणिक संस्थानों में मौजूद जातिगत भेदभाव और सामाजिक अन्याय का प्रतीक बनी हुई है। हर साल उनकी पुण्यतिथि पर देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, जहां छात्र, शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता समानता, गरिमा और न्याय की मांग दोहराते हैं। रोहित की याद आज भी एक सवाल बनकर खड़ी है—क्या समाज और संस्थान सच में सबके लिए समान हैं?
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