उद्योग की परिभाषा में आएंगे क्या संप्रभु कार्य? सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की पीठ 17 मार्च से सुनवाई करेगी
सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ 17 मार्च से सुनवाई करेगी कि क्या सरकारी संप्रभु कार्य, शैक्षणिक संस्थान और अस्पताल ‘उद्योग’ की परिभाषा में आते हैं।
नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ 17 मार्च से एक महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई शुरू करेगी, जिसमें यह तय किया जाएगा कि क्या सरकार के संप्रभु कार्य, शैक्षणिक संस्थान और अस्पताल ‘औद्योगिक गतिविधि’ की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं या नहीं। यह प्रश्न औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत उठाया गया है।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने सोमवार (16 फरवरी 2026) को इस मामले को नौ जजों की संविधान पीठ के समक्ष रखने का निर्णय लिया। यह उनके कार्यकाल में गठित होने वाली पहली नौ जजों की संविधान पीठ होगी।
यह संदर्भ 1978 में न्यायमूर्ति वी.आर. कृष्ण अय्यर द्वारा दिए गए सात जजों की पीठ के ‘प्रो-लेबर’ (श्रम समर्थक) फैसले पर आधारित है। उस ऐतिहासिक निर्णय में ‘उद्योग’ की परिभाषा का व्यापक विस्तार किया गया था, जिससे कई सरकारी और अर्ध-सरकारी संस्थानों को भी इसके दायरे में माना गया।
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अब सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट करेगा कि क्या शिक्षा संस्थान, अस्पताल और सरकार के संप्रभु कार्य—जैसे कानून-व्यवस्था, रक्षा या प्रशासनिक गतिविधियां—औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत ‘उद्योग’ माने जाएंगे।
इस फैसले का असर लाखों कर्मचारियों और सरकारी संस्थानों पर पड़ सकता है, क्योंकि ‘उद्योग’ की परिभाषा में आने से कर्मचारियों को श्रम कानूनों के तहत अधिक अधिकार और सुरक्षा मिलती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह सुनवाई श्रम कानूनों और सरकारी कार्यों की सीमाओं को लेकर एक महत्वपूर्ण संवैधानिक व्याख्या प्रदान करेगी।