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सुप्रीम कोर्ट ने रद्द की ओडिशा में आदिवासी-दलित आरोपियों पर थोपे गए अपमानजनक जमानत शर्तें

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा में आदिवासी और दलित आरोपियों से पुलिस स्टेशन साफ कराने जैसी जमानत शर्तों को रद्द किया। अदालत ने इसे अपमानजनक और जातिगत पूर्वाग्रह बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा में निचली अदालतों द्वारा आदिवासी और दलित समुदाय के आरोपियों पर लगाई गई “अपमानजनक” जमानत शर्तों को रद्द कर दिया है। इन शर्तों के तहत आरोपियों को जमानत पाने के लिए पुलिस थानों की सफाई जैसे कार्य करने के लिए कहा गया था।

यह मामला तब सामने आया जब उच्चतम न्यायालय ने इन शर्तों को “अभद्र, अपमानजनक और कानून के विरुद्ध” बताया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने सात पन्नों के आदेश में स्पष्ट कहा कि ऐसी शर्तें न्यायिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।

अदालत ने कहा कि भले ही ये शर्तें अनजाने में लगाई गई हों, लेकिन इनका स्वरूप इतना आपत्तिजनक है कि यह न्यायपालिका में जातिगत पूर्वाग्रह की आशंका पैदा करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह “पिछड़ी सोच” और जाति आधारित मानसिकता को दर्शाता है, जिसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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मामले में यह भी सामने आया कि ओडिशा की निचली अदालतों और उच्च न्यायालय ने कई बार ऐसे आरोपियों को जमानत देने के लिए अपमानजनक शर्तें लगाईं, जो संविधान की भावना के खिलाफ हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में सभी उच्च न्यायालयों को चेतावनी दी है कि भविष्य में इस तरह की शर्तें न लगाई जाएं और जमानत देने की प्रक्रिया में संवैधानिक अधिकारों का पूरा सम्मान किया जाए।

अदालत ने यह भी कहा कि न्यायपालिका का उद्देश्य समानता और गरिमा की रक्षा करना है, न कि किसी भी समुदाय के साथ भेदभाव करना।

यह फैसला देश में न्यायिक प्रक्रिया में समानता और सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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