सोहराय कला: प्रकृति का उत्सव मनाने वाली झारखंड की आदिवासी दीवार कला, अब महिलाओं को बना रही आत्मनिर्भर
झारखंड की पारंपरिक सोहराय दीवार कला, जो प्रकृति और पशुधन का उत्सव मनाती है, अब राष्ट्रीय पहचान के साथ महिलाओं को आजीविका और आत्मनिर्भरता का माध्यम बन रही है।
सोहराय कला झारखंड की एक प्राचीन और विशिष्ट आदिवासी दीवार कला है, जो प्रकृति, पशुधन और खेती के प्रति कृतज्ञता को रंगों और प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त करती है। यह कला मुख्य रूप से हजारीबाग जिले से जुड़ी मानी जाती है और परंपरागत रूप से दीपावली के अगले दिन घरों की दीवारों पर बनाई जाती है। सोहराय की दीवारें केवल सजावट नहीं होतीं, बल्कि वे प्रकृति की उदारता और ग्रामीण जीवन की समृद्ध परंपराओं का जीवंत दस्तावेज होती हैं।
बीते कुछ वर्षों में सोहराय कला को देश और दुनिया में नई पहचान मिली है। वर्ष 2025 में राष्ट्रपति भवन में आयोजित ‘कला उत्सव’ में इसकी प्रस्तुति से लेकर 2024 में प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ कार्यक्रम में इसके उल्लेख तक, इस लोककला ने व्यापक लोकप्रियता हासिल की है। आज सोहराय कलाकार भारत के विभिन्न शहरों में बड़े-बड़े दीवार चित्र बना रहे हैं, जो इस कला को वैश्विक मंच पर ले जा रहे हैं।
सोहराय केवल कला नहीं, बल्कि एक कृषि पर्व भी है, जिसे झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल और ओडिशा के आदिवासी समुदाय धान की फसल कटने के समय मनाते हैं। यह पर्व मानव और प्रकृति के बीच गहरे पारिस्थितिक संबंध को दर्शाता है। इन चित्रों में पशुधन का विशेष महत्व होता है, क्योंकि ग्रामीण और गरीब समुदायों के लिए भूमि और प्राकृतिक संसाधनों के बाद पशु सबसे अहम संपत्ति माने जाते हैं।
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वर्ष 2020 में सोहराय कला को खोवर कला के साथ भौगोलिक संकेतक (GI) टैग मिला, जिससे इसकी सांस्कृतिक पहचान को आधिकारिक मान्यता मिली। आज यह कला न केवल परंपरा को जीवित रखे हुए है, बल्कि महिलाओं को आजीविका और आत्मनिर्भरता का साधन भी प्रदान कर रही है। कई ग्रामीण महिलाएं सोहराय कला के जरिए आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं और अपनी सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं।
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