क्या अंतिम रिपोर्ट के बाद आगे जांच के लिए कोर्ट की अनुमति जरूरी है? सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया अहम नियम
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अंतिम रिपोर्ट के बाद आगे जांच के लिए मजिस्ट्रेट की अनुमति जरूरी है। अनुमति न होने पर एफआईआर और चार्जशीट रद्द की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि जब पुलिस किसी मामले में अंतिम रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) दाखिल कर देती है, तो आगे की जांच (फर्दर इन्वेस्टिगेशन) शुरू करने के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट की अनुमति लेना अनिवार्य होता है। यह टिप्पणी कोर्ट ने ‘पलिनिस्वामी वीराराजा एवं अन्य बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य’ मामले में की।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर और उसके बाद दाखिल आरोप पत्र (चार्जशीट) को रद्द कर दिया, क्योंकि जांच एजेंसी ने आगे की जांच शुरू करने से पहले आवश्यक न्यायिक अनुमति नहीं ली थी।
कोर्ट ने कहा कि हालांकि जांच एजेंसी ने तीसरी बार मजिस्ट्रेट के समक्ष आगे की जांच के लिए आवेदन दिया था, लेकिन रिकॉर्ड में ऐसा कोई आदेश मौजूद नहीं था जिससे यह साबित हो कि अनुमति दी गई थी। इसके पहले भी जांच एजेंसी दो बार क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर चुकी थी, जिसमें यह कहा गया था कि विवाद पूरी तरह से सिविल प्रकृति का प्रतीत होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में ‘स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल (1992)’ के फैसले का भी हवाला दिया और कहा कि जब मामला स्पष्ट रूप से सिविल प्रकृति का हो, तो एफआईआर और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना उचित होता है।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार जांच एजेंसी को अंतिम रिपोर्ट के बाद आगे की जांच शुरू करने से पहले न्यायिक निगरानी और अनुमति का पालन करना आवश्यक है, ताकि प्रक्रिया की पारदर्शिता और वैधता बनी रहे।
यह निर्णय जांच प्रक्रिया में न्यायिक नियंत्रण की भूमिका को मजबूत करता है और यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी नागरिक के खिलाफ अनावश्यक आपराधिक कार्रवाई न हो।
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