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नाबालिग गर्भसमापन मामले में सुप्रीम कोर्ट की केंद्र को फटकार, कहा- नागरिकों का सम्मान करें

सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग गर्भसमापन मामले में केंद्र को फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि निर्णय पीड़िता और परिवार का अधिकार है, न कि सरकार का हस्तक्षेप।

सुप्रीम कोर्ट ने 15 वर्षीय दुष्कर्म पीड़िता के गर्भसमापन मामले में केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि इस तरह के फैसले पीड़िता और उसके परिवार पर छोड़ने चाहिए, न कि सरकार पर।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र द्वारा दायर क्यूरेटिव याचिका पर नाराजगी जताते हुए कहा कि सरकार को नागरिकों का सम्मान करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि इस मामले को चुनौती देने का अधिकार केवल पीड़िता या उसके परिवार को है।

पीठ में शामिल न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने भी सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि व्यक्तिगत विकल्पों का सम्मान किया जाना चाहिए। अदालत ने कहा कि माता-पिता को पूरी चिकित्सकीय जानकारी देकर निर्णय लेने का अधिकार मिलना चाहिए।

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सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि बलात्कार से जुड़े मामलों में गर्भसमापन के लिए समय सीमा पर पुनर्विचार की जरूरत है। अदालत ने कहा कि कानून को समय के साथ विकसित होना चाहिए।

केंद्र सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि गर्भसमापन इस चरण में जोखिम भरा हो सकता है और पीड़िता बच्चे को जन्म देकर गोद देने का विकल्प चुन सकती है। हालांकि, अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि इससे पीड़िता पर मानसिक और भावनात्मक प्रभाव पड़ेगा।

कोर्ट ने कहा, “अगर यह एक बच्चे और भ्रूण के बीच की लड़ाई बन जाती है, तो बच्चे को सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया जाना चाहिए।”

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने नाबालिग को 31 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी थी, यह कहते हुए कि उसे मजबूर करना उसके गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार का उल्लंघन होगा।

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