एथनॉल विवाद: पेट्रोल पंपों पर ईंधन में एथनॉल की मात्रा बताना अनिवार्य करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार
सुप्रीम कोर्ट ने पेट्रोल पंपों पर एथनॉल प्रतिशत अनिवार्य रूप से बताने की जनहित याचिका खारिज कर दी। अदालत ने याचिकाकर्ता को सक्षम प्राधिकरण या हाईकोर्ट जाने की अनुमति दी।
पेट्रोल में एथनॉल की मात्रा की अनिवार्य और समान जानकारी देने की मांग वाली जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। याचिकाकर्ता नरेंद्र कुमार गोस्वामी ने मांग की थी कि देशभर के पेट्रोल पंपों पर ईंधन भरने वाली प्रत्येक मशीन के नोजल पर पेट्रोल में मौजूद एथनॉल का सटीक प्रतिशत स्पष्ट और आसानी से पढ़े जाने वाले तरीके से प्रदर्शित किया जाए।
न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश और न्यायमूर्ति पीबी वराले की पीठ ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अपनी शिकायत संबंधित सक्षम प्राधिकरण के समक्ष रख सकता है। अदालत ने कहा कि वह संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इस जनहित याचिका पर सुनवाई नहीं करना चाहती। साथ ही, याचिकाकर्ता को राहत के लिए संबंधित अधिकार क्षेत्र वाले हाईकोर्ट जाने की स्वतंत्रता दी गई।
केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह एक तरह की प्रॉक्सी लिटिगेशन है, क्योंकि इसी तरह के मुद्दे पर पहले भी एक याचिका अदालत खारिज कर चुकी है।
गोस्वामी ने अदालत के समक्ष कहा कि प्रत्येक नागरिक को यह जानने का अधिकार है कि पेट्रोल पंप से उसे किस संरचना वाला ईंधन दिया जा रहा है। उन्होंने मांग की कि प्रत्येक ईंधन बिल पर पेट्रोल में मौजूद एथनॉल का प्रतिशत स्पष्ट रूप से दर्ज किया जाए।
याचिका में एथनॉल मिश्रित पेट्रोल के इस्तेमाल को लेकर वाहनवार सार्वजनिक डेटाबेस बनाने की भी मांग की गई थी। इसमें वाहन निर्माता, मॉडल, इंजन के प्रकार और निर्माण वर्ष के आधार पर यह जानकारी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया था कि कौन-सा एथनॉल मिश्रण किस वाहन के लिए उपयुक्त है।
इसके अलावा, याचिकाकर्ता ने पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, भारतीय मानक ब्यूरो और स्वतंत्र ऑटोमोबाइल इंजीनियरों के प्रतिनिधियों वाली विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की थी। समिति से ई20 ईंधन के वाहनों पर प्रभाव, ईंधन दक्षता, इंजन की उम्र, रखरखाव लागत, वारंटी, बीमा, पर्यावरणीय प्रभाव और एथनॉल उत्पादन से जुड़े पानी की खपत तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी चिंताओं पर सार्वजनिक रिपोर्ट देने को कहा गया था।
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