एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई: ईसीआई के आदेश में अवैध घुसपैठ का स्पष्ट उल्लेख नहीं, पीठ की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एसआईआर पर ईसीआई के आदेश में अवैध घुसपैठ का स्पष्ट उल्लेख नहीं है और चुनावी सूची संशोधन में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन जरूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (22 जनवरी, 2026) को पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन – SIR) के संचालन में कथित अनियमितताओं को लेकर तृणमूल कांग्रेस के नेताओं द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखी। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि इस प्रक्रिया के दौरान कई मतदाताओं के नाम चुनावी सूची से हटा दिए गए।
इससे पहले बुधवार को अदालत ने कहा था कि निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को चुनावी सूचियों के पुनरीक्षण में “व्यापक विवेकाधिकार” प्राप्त हैं, लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण 2025 जैसी प्रक्रिया में किए गए “विचलन” प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के तहत निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन करते हुए “असीमित या अनियंत्रित” नहीं हो सकते।
ईसीआई की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने दलील दी कि एसआईआर 2025 संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत पूरी तरह वैध और टिकाऊ है। उन्होंने कहा कि यह प्रक्रिया चुनावी सूचियों की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है।
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ईसीआई ने इस मामले में अमेरिकी ‘ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ’ के सिद्धांत को लागू करने की आलोचना भी की। द्विवेदी ने कहा कि अमेरिका स्वयं इस सिद्धांत का कड़ाई से पालन नहीं करता, और उदाहरण के तौर पर वेनेजुएला के राष्ट्रपति तथा ग्रीनलैंड से जुड़े घटनाक्रमों का उल्लेख किया।
उन्होंने यह भी कहा कि 2003 के संशोधन के अनुसार मतदाता को अपने माता-पिता से संबंध साबित करना आवश्यक है, और इसी के अनुरूप एसआईआर में 2002 की मतदाता सूची से जुड़ाव दिखाने की शर्त रखी गई है।
हालांकि, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने टिप्पणी की कि ईसीआई के एसआईआर आदेश में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया है कि यह प्रक्रिया अवैध घुसपैठ की जांच के लिए भी है। उन्होंने कहा कि ‘माइग्रेशन’ में आंतरिक और बाहरी दोनों तरह के स्थानांतरण आते हैं, लेकिन अवैधता का सवाल केवल बाहरी आव्रजन में उठता है। अदालत ने कहा कि एसआईआर आदेश में इस पहलू को स्पष्ट रूप से रेखांकित नहीं किया गया है।
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