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करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के आदेश पर मद्रास हाईकोर्ट की रोक, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने करूर भगदड़ पीड़ितों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के तमिलनाडु सरकार के फैसले पर मद्रास हाईकोर्ट की रोक हटाई और याचिकाकर्ता से सवाल किया।

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें तमिलनाडु सरकार द्वारा करूर भगदड़ में जान गंवाने वाले लोगों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने के फैसले को रद्द कर दिया गया था। इस भगदड़ में 41 लोगों की मौत हुई थी।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की दो सदस्यीय पीठ ने अंतरिम आदेश जारी करते हुए तमिलनाडु के मुख्य सचिव डॉ. एम. साई कुमार समेत अन्य पक्षों को नोटिस जारी किया। अदालत ने सरकार के फैसले को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता से भी सवाल किया।

सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि सरकार की नीति पर सवाल उठाने वाले याचिकाकर्ता को ऐसा करने का अधिकार किस आधार पर है। अदालत ने यह भी कहा कि यदि किसी परिवार का इकलौता सदस्य हादसे में मारा गया हो, तो क्या सरकार उसके बेटे या बेटी को रोजगार देकर सहायता नहीं कर सकती?

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करूर भगदड़ में गई थीं 41 जानें

करूर में 27 सितंबर 2025 को यह दर्दनाक हादसा हुआ था। तमिलगा वेट्री कज़गम (टीवीके) के संस्थापक सी. जोसेफ विजय 2026 के विधानसभा चुनावों के लिए एक रैली में शामिल होने करूर पहुंचे थे। इसी दौरान भारी भीड़ के कारण भगदड़ मच गई, जिसमें 41 लोगों की मौत हुई और कई अन्य घायल हुए।

विधानसभा चुनाव में जीत के बाद विजय ने हादसे में जान गंवाने वालों के परिजनों को सरकारी नौकरी देने का फैसला किया था। बाद में 10 मई को तमिलनाडु के 22वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के बाद उन्होंने 31 पीड़ित परिवारों के सदस्यों को नियुक्ति पत्र भी सौंपे।

हालांकि, मद्रास हाईकोर्ट ने 27 जुलाई को इस फैसले को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि इस तरह की नियुक्तियां भविष्य में समान मांगों का रास्ता खोल सकती हैं और संविधान के अनुच्छेद 14 तथा 16 में दिए गए समानता के अधिकार से जुड़ी समस्याएं पैदा कर सकती हैं।

अब सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के बाद करूर भगदड़ पीड़ितों के परिवारों को बड़ी राहत मिली है। मामले में अगली सुनवाई के दौरान अदालत इस नीति और नियुक्तियों से जुड़े कानूनी पहलुओं पर आगे विचार करेगी।

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