हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जजों के लिए समान सुविधाओं की नीति बनाए केंद्र: सुप्रीम कोर्ट का निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह में समिति गठित कर हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों और जजों के लिए समान सेवानिवृत्ति सुविधाओं की नीति बनाने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह देशभर के उच्च न्यायालयों (हाईकोर्ट) के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों को दी जाने वाली सेवानिवृत्ति के बाद की सुविधाओं के लिए एक समान नीति तैयार करे। अदालत ने केंद्र को इस उद्देश्य के लिए दो सप्ताह के भीतर एक समिति गठित करने का निर्देश दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग राज्यों और उच्च न्यायालयों में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को मिलने वाली सुविधाओं में समानता होनी चाहिए। इसके लिए एक ऐसी व्यवस्था तैयार करने की जरूरत है, जिसमें सभी हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों के लिए स्पष्ट और एक समान दिशानिर्देश हों।
अदालत ने केंद्र सरकार से कहा कि गठित की जाने वाली समिति सभी संबंधित पहलुओं पर विचार करे और एक व्यापक नीति का मसौदा तैयार करे। इस नीति में सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को मिलने वाली विभिन्न सुविधाओं, जैसे आवास, चिकित्सा सहायता और अन्य आवश्यक सेवाओं से जुड़े प्रावधानों को शामिल किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्देश न्यायपालिका से जुड़े सेवानिवृत्त अधिकारियों के कल्याण और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने कहा कि देशभर में न्यायिक अधिकारियों के लिए सुविधाओं में असमानता को दूर करना आवश्यक है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि हाईकोर्ट के न्यायाधीश देश की न्याय व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं और सेवानिवृत्ति के बाद उनके लिए उचित एवं सम्मानजनक सुविधाएं उपलब्ध कराना जरूरी है।
केंद्र सरकार द्वारा गठित समिति में संभवतः न्यायपालिका और सरकार से जुड़े विशेषज्ञों को शामिल किया जा सकता है, जो मौजूदा व्यवस्थाओं का अध्ययन कर एक समान नीति तैयार करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अब केंद्र सरकार को निर्धारित समय सीमा के भीतर समिति का गठन करना होगा। इसके बाद समिति अपनी सिफारिशें तैयार कर सरकार को सौंपेगी, जिसके आधार पर देशभर में हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए समान सुविधाओं की नीति लागू की जा सकती है।
यह कदम न्यायपालिका में एकरूपता और पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में अहम पहल माना जा रहा है।