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मतदाता सूची विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का सवाल: कई बार संशोधन झेल चुके मतदाताओं को नागरिक मानने की धारणा क्यों नहीं?

सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची संशोधन पर सवाल उठाते हुए पूछा कि कई बार सूची में बने मतदाताओं को नागरिक मानने की धारणा क्यों नहीं अपनाई जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (15 जनवरी 2026) को निर्वाचन आयोग (ईसीआई) से एक बुनियादी सवाल पूछा, जो विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन–SIR) के तहत मतदाता सूचियों में बदलाव को चुनौती देने वाली याचिकाओं में बार-बार उठाया गया है। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ ने पूछा, “क्या हम यह सुरक्षित रूप से नहीं मान सकते कि वे मतदाता, जो कई बार मतदाता सूची के संशोधनों से गुजर चुके हैं, भारतीय नागरिक हैं?”

यह सवाल अदालत में उस समय उठा जब 1995 के सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले पर चर्चा हो रही थी। उस फैसले में यह स्पष्ट किया गया था कि जो व्यक्ति पहले से ही मतदाता सूची में दर्ज है, उससे नागरिकता साबित करने के लिए दस्तावेज़ मांगना उचित नहीं है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि किसी व्यक्ति का नाम कई बार संशोधित मतदाता सूचियों में बना रहा है, तो उसकी नागरिकता पर संदेह करना तर्कसंगत नहीं लगता।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि एसआईआर के नाम पर बड़ी संख्या में मतदाताओं से नागरिकता से जुड़े दस्तावेज़ मांगे जा रहे हैं, जिससे गरीब, प्रवासी और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। उनका कहना है कि बार-बार सत्यापन की प्रक्रिया मताधिकार के संवैधानिक अधिकार को कमजोर कर सकती है।

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वहीं, निर्वाचन आयोग की ओर से यह दलील दी गई है कि मतदाता सूची को शुद्ध और अद्यतन बनाए रखना उसका संवैधानिक दायित्व है, ताकि अवैध या अपात्र नामों को हटाया जा सके। आयोग का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण का उद्देश्य किसी को अनावश्यक रूप से परेशान करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी संकेत दिया कि नागरिकता से जुड़े सवालों में संतुलन बनाए रखना जरूरी है, ताकि एक ओर लोकतंत्र की शुचिता बनी रहे और दूसरी ओर वास्तविक मतदाताओं को अनावश्यक रूप से परेशान न किया जाए। मामले की आगे की सुनवाई में कोर्ट निर्वाचन आयोग से इस मुद्दे पर विस्तृत जवाब की अपेक्षा कर सकता है।

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