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तेलंगाना हाईकोर्ट का CRPF पर सख्त रुख: लापता जवान के प्रति जिम्मेदारी से नहीं हो सकता पल्ला झाड़ना

तेलंगाना हाईकोर्ट ने CRPF को निर्देश दिया कि 2015 से लापता कांस्टेबल के परिजनों को सेवा और पेंशन लाभ दिए जाएं, और सेवा से हटाने का आदेश रद्द किया।

तेलंगाना हाईकोर्ट ने केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि बल अपने किसी भी सदस्य के प्रति जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। अदालत ने वर्ष 2015 से लापता एक कांस्टेबल के परिजनों को बड़ी राहत देते हुए CRPF को उसके सेवा संबंधी और पेंशन लाभों की प्रक्रिया पूरी कर भुगतान करने का निर्देश दिया है। साथ ही, कोर्ट ने CRPF के उस 2017 के आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें लापता कांस्टेबल को “सेवा से हटाया गया” घोषित किया गया था।

मुख्य न्यायाधीश अपरेश कुमार सिंह और न्यायमूर्ति जी. एम. मोहीउद्दीन की खंडपीठ ने 19 जनवरी को दिए गए फैसले में स्पष्ट किया कि CRPF अपने कर्मियों के प्रति उत्तरदायित्व से बच नहीं सकता। अदालत ने कहा कि लापता जवान के पिता द्वारा एफआईआर दर्ज कराना, सेवा लाभों के दावे पर विचार करने के लिए अनिवार्य शर्त नहीं हो सकती।

पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा, “यदि CRPF के उत्तरदायी अधिकारी इस तरह का रवैया अपनाते हैं, तो इससे परिवारों को अपने बच्चों को बल में भेजने से हतोत्साहित किया जाएगा।” अदालत ने यह भी कहा कि कानून के तहत कानूनी उत्तराधिकारी या नामित व्यक्ति सेवा और पेंशन लाभ पाने के हकदार हैं और इसके लिए अनावश्यक शर्तें नहीं थोपी जा सकतीं।

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अदालत ने माना कि एक दशक से अधिक समय से लापता जवान के मामले में CRPF का यह कहना कि एफआईआर के बिना लाभ नहीं दिए जा सकते, न केवल अनुचित है बल्कि मानवीय दृष्टिकोण के भी खिलाफ है। हाईकोर्ट के इस फैसले को सुरक्षाबलों में कार्यरत कर्मियों और उनके परिवारों के अधिकारों की रक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

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