तीस हजारी अदालत ने सीबीआई संयुक्त निदेशक और पूर्व पुलिस अधिकारी को 2000 छापेमारी मामले में दोषी ठहराया
तीस हजारी अदालत ने 2000 छापेमारी मामले में सीबीआई अधिकारी रामनीश और पूर्व पुलिसकर्मी वी.के. पांडे को मारपीट, अवैध प्रवेश और नुकसान पहुंचाने का दोषी करार दिया।
दिल्ली की तीस हजारी अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सीबीआई के संयुक्त निदेशक रामनीश और दिल्ली पुलिस के सेवानिवृत्त अधिकारी वी.के. पांडे को दोषी ठहराया है। दोनों पर मारपीट, जबरन घर में घुसने और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप सिद्ध हुए हैं। यह मामला वर्ष 2000 में एक आईआरएस अधिकारी के आवास पर की गई छापेमारी से जुड़ा हुआ है।
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि यह छापेमारी और गिरफ्तारी सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं थी, बल्कि इसे जानबूझकर केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के आदेश को निष्प्रभावी करने के लिए अंजाम दिया गया था। यह फैसला न्यायाधीश शशांक नंदन भट्ट की अदालत द्वारा शनिवार को सुनाया गया।
अदालत के अनुसार, 19 अक्टूबर 2000 को की गई छापेमारी पहले से योजनाबद्ध थी। 28 सितंबर 2000 को कैट ने संबंधित अधिकारी की निलंबन समीक्षा का आदेश दिया था। इसके बावजूद 18 अक्टूबर को सीबीआई में एक बैठक हुई, जिसमें अगले दिन छापेमारी और गिरफ्तारी का निर्णय लिया गया।
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अदालत ने यह भी पाया कि आरोपियों ने शिकायतकर्ता के घर में जबरन प्रवेश किया। मुख्य दरवाजा तोड़कर अधिकारी को उसके कमरे से बाहर खींचा गया और सीढ़ियों पर उसके साथ मारपीट की गई, जिससे उसे चोटें आईं। मेडिकल रिपोर्ट और गवाहों ने इसकी पुष्टि की।
अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कृत्य आपराधिक घुसपैठ, तोड़फोड़ और चोट पहुंचाने की श्रेणी में आता है और इसे आधिकारिक कर्तव्य नहीं माना जा सकता। इसलिए आरोपियों को किसी भी प्रकार की कानूनी सुरक्षा का लाभ नहीं मिलेगा।
शिकायतकर्ता अशोक कुमार अग्रवाल, 1985 बैच के आईआरएस अधिकारी थे, जो उस समय प्रवर्तन निदेशालय में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत थे। अदालत ने माना कि उनके खिलाफ की गई कार्रवाई अनुचित थी और कैट के आदेश को निष्प्रभावी करने का प्रयास था।
अंत में अदालत ने रामनीश और वी.के. पांडे को आईपीसी की संबंधित धाराओं में दोषी करार दिया।
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