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पश्चिम बंगाल में TMC की फूट सिर्फ ट्रेलर? ममता बनर्जी की पार्टी के सामने संसद में भी गहरा सकता है संकट

पश्चिम बंगाल में टीएमसी के 58 विधायकों की बगावत के बाद पार्टी संकट में है। अब असंतोष संसद तक पहुंचने की आशंका है, जिससे विपक्ष और कमजोर हो सकता है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को अपने 28 साल के इतिहास का सबसे बड़ा झटका लगा है। बागी नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में 58 विधायकों ने पार्टी से अलग होकर नया विधायी गुट बना लिया है। पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष रथींद्र बोस ने इस गुट को मान्यता देते हुए ऋतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष के रूप में स्वीकार कर लिया। इससे विधानसभा में टीएमसी के विधायी दल पर पार्टी नेतृत्व की पकड़ कमजोर पड़ गई है।

यह टीएमसी के इतिहास में पहली औपचारिक टूट मानी जा रही है। हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा था। दल-बदल विरोधी कानून के तहत अलग गुट की मान्यता के लिए आवश्यक दो-तिहाई संख्या से अधिक विधायक बागियों के साथ चले गए, जिससे यह विभाजन कानूनी रूप से मजबूत हो गया।

इस घटनाक्रम के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व ने राज्यभर में पार्टी की सभी संगठनात्मक समितियों और प्रकोष्ठों को भंग कर दिया। इसे संगठन पर दोबारा नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

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हालांकि चुनौती केवल विधानसभा तक सीमित नहीं दिख रही है। पिछले कुछ महीनों में कई सांसदों और वरिष्ठ नेताओं ने पार्टी की कार्यप्रणाली, उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक ढांचे पर सवाल उठाए हैं। काकोली घोष दस्तीदार, सुखेंदु शेखर रॉय और शांतनु सेन जैसे नेताओं ने सार्वजनिक रूप से असंतोष व्यक्त किया है। वहीं अभिनेता से नेता बने सांसद दीपक देव अधिकारी (देव) के कुछ बयानों ने भी राजनीतिक अटकलों को हवा दी है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह असंतोष संसद तक पहुंचता है तो टीएमसी की ताकत कमजोर हो सकती है। इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को मिल सकता है। विशेष रूप से संसद में महत्वपूर्ण विधेयकों पर विपक्ष की एकजुटता प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।

कई रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि पार्टी के भीतर नाराजगी का एक बड़ा कारण अभिषेक बनर्जी का बढ़ता प्रभाव और सीमित नेतृत्व समूह में निर्णय लेने की प्रक्रिया है। हालांकि अधिकांश असंतुष्ट नेता अब भी ममता बनर्जी के प्रति सम्मान जताते हुए संगठनात्मक ढांचे में बदलाव की मांग कर रहे हैं।

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