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संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर घमासान, संख्या बल बनेगा सबसे बड़ा फैक्टर

संसद में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर बहस तेज है। सरकार को विशेष बहुमत के लिए अन्य दलों का समर्थन जरूरी, जिससे विधेयकों का भविष्य संख्या बल पर निर्भर है।

संसद के विशेष सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन से जुड़े अहम विधेयकों पर चर्चा शुरू हो गई है, जहां सरकार और विपक्ष के बीच तीखी बहस की संभावना है। केंद्र सरकार संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक पेश कर रही है। इनका उद्देश्य लोकसभा सीटों का पुनर्गठन, सीटों की संख्या बढ़ाना और महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण लागू करना है।

हालांकि अधिकांश विपक्षी दल महिला आरक्षण के पक्ष में हैं, लेकिन वे परिसीमन प्रक्रिया को इससे जोड़ने का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि बिना परिसीमन के भी महिला आरक्षण लागू किया जा सकता है।

लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) 292 सीटों के साथ बहुमत में है, जो साधारण विधेयक पास करने के लिए पर्याप्त है। लेकिन संविधान संशोधन के लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है, जिसमें कुल सदस्यों का आधे से अधिक और उपस्थित व मतदान करने वाले सदस्यों का दो-तिहाई समर्थन जरूरी होता है। इस हिसाब से सरकार को करीब 360 वोट चाहिए होंगे, जिससे उसे अन्य दलों का समर्थन लेना पड़ेगा।

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राज्यसभा में भी एनडीए के पास लगभग 141 सीटें हैं, जबकि दो-तिहाई बहुमत के लिए 164 वोटों की जरूरत है। यानी यहां भी सरकार को करीब 20 से अधिक अतिरिक्त समर्थन जुटाना होगा।

इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार वाईएसआरसीपी, बीजेडी और बीआरएस जैसे गैर-एनडीए दलों से समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है। ऐसे में इन विधेयकों का भविष्य पूरी तरह संख्या बल और राजनीतिक सहमति पर निर्भर करेगा।

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