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म्यांमार शरणार्थी ने दिल्ली हाईकोर्ट में दी डीयू के पासपोर्ट नियम को चुनौती, बिना पासपोर्ट प्रवेश की मांग

म्यांमार के एक मान्यता प्राप्त शरणार्थी ने दिल्ली हाईकोर्ट में डीयू की प्रवेश नीति को चुनौती दी है। याचिकाकर्ता ने बिना गैर-भारतीय पासपोर्ट दाखिले की मांग की है।

म्यांमार के एक मान्यता प्राप्त शरणार्थी ने दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) की उस प्रवेश नीति को चुनौती दी है, जिसमें विदेशी छात्रों के लिए गैर-भारतीय पासपोर्ट होना अनिवार्य किया गया है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह नियम शरणार्थियों को शिक्षा के अधिकार से प्रभावी रूप से वंचित करता है, क्योंकि शरणार्थियों के पास कई बार अपने देश का वैध पासपोर्ट उपलब्ध नहीं होता।

याचिका में कहा गया है कि शरणार्थी होने की स्थिति में व्यक्ति अपने मूल देश के दस्तावेजों या पासपोर्ट तक पहुंच नहीं रख सकता। ऐसे में विश्वविद्यालय की यह अनिवार्यता उन लोगों के लिए बाधा बन जाती है, जो संघर्ष या असुरक्षा के कारण अपना देश छोड़ने को मजबूर हुए हैं।

याचिकाकर्ता ने अदालत से मांग की है कि दिल्ली विश्वविद्यालय को ऐसे मामलों में मानवीय आधार पर वैकल्पिक दस्तावेज स्वीकार करने के निर्देश दिए जाएं। उनका तर्क है कि केवल पासपोर्ट के आधार पर प्रवेश से इनकार करना शरणार्थियों के साथ भेदभाव के समान है।

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मामले में याचिकाकर्ता ने कहा कि वह भारत में मान्यता प्राप्त शरणार्थी के रूप में रह रहा है और उच्च शिक्षा हासिल करना चाहता है। लेकिन डीयू की विदेशी छात्रों से जुड़ी प्रवेश नीति के कारण उसके लिए दाखिला लेना मुश्किल हो गया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय की नीति के अनुसार विदेशी छात्रों को प्रवेश के लिए वैध विदेशी पासपोर्ट और अन्य आवश्यक दस्तावेज जमा करने होते हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि शरणार्थियों के लिए यह शर्त व्यावहारिक रूप से पूरी करना संभव नहीं होती।

अब दिल्ली हाईकोर्ट इस मामले की सुनवाई करेगा और यह तय करेगा कि शरणार्थियों के लिए विश्वविद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया में कोई विशेष व्यवस्था की आवश्यकता है या नहीं।

यह मामला शिक्षा के अधिकार, शरणार्थियों की पहचान और दस्तावेजी आवश्यकताओं के बीच संतुलन से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा माना जा रहा है। अदालत के फैसले का असर भविष्य में भारत में रह रहे अन्य शरणार्थी छात्रों की शिक्षा संबंधी सुविधाओं पर भी पड़ सकता है।

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