महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों से दो कहानियां और भारतीय राजनीति की एक पहेली
महाराष्ट्र के स्थानीय चुनावों में बीजेपी-कांग्रेस और बीजेपी-AIMIM जैसे अप्रत्याशित गठबंधन दिखाते हैं कि जमीनी राजनीति में विचारधारा से ज्यादा सत्ता और व्यावहारिकता हावी रहती है।
महाराष्ट्र में चल रहे स्थानीय निकाय चुनावों की कहानी में दो ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जो भारतीय राजनीति की जमीनी हकीकत को उजागर करती हैं। ये घटनाएं दिखाती हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और वैचारिक ध्रुवीकरण चाहे जितना तीखा हो, स्थानीय स्तर पर राजनीति कहीं अधिक धुंधली और व्यवहारिक होती है।
ठाणे जिले के अंबरनाथ नगर निकाय में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने एक चौंकाने वाला कदम उठाते हुए अपने लंबे समय के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस के साथ मिलकर “अंबरनाथ विकास आघाड़ी” का गठन किया। इस गठबंधन का उद्देश्य राज्य की सत्तारूढ़ गठबंधन सहयोगी शिंदे गुट की शिवसेना को सत्ता से बाहर रखना था। यह साझेदारी इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि बीजेपी और कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं।
इसी तरह की एक और दिलचस्प कहानी अकोला जिले के अकोट नगर निकाय से सामने आई है। यहां बीजेपी ने एक और वैचारिक सीमा लांघते हुए ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के साथ खुला गठबंधन किया। दोनों दलों ने मिलकर “अकोट विकास मंच” बनाया, ताकि नगर निकाय में बहुमत हासिल किया जा सके। AIMIM को अक्सर एक “मुस्लिम पार्टी” के रूप में देखा जाता है, और बीजेपी के साथ इसका गठबंधन राजनीतिक दृष्टि से असामान्य माना जाता है।
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ये दोनों उदाहरण इस बात की ओर इशारा करते हैं कि स्थानीय राजनीति में विचारधारा से ज्यादा सत्ता संतुलन, संख्या बल और तात्कालिक राजनीतिक लाभ अहम हो जाते हैं। ऊपर के स्तर पर जहां राजनीतिक बयानबाजी और वैचारिक ध्रुवीकरण हावी रहता है, वहीं नीचे, नगर निकाय और स्थानीय चुनावों में, गठबंधन और विरोध की रेखाएं काफी लचीली हो जाती हैं।
महाराष्ट्र के ये स्थानीय चुनाव इस सच्चाई को रेखांकित करते हैं कि भारतीय राजनीति केवल सख्त वैचारिक खांचों में बंटी नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर इसमें काफी हद तक व्यवहारिक समझौते और अवसरवादी गठबंधन भी शामिल हैं।
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