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उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत से इनकार पर विपक्ष का सवाल, गुरमीत राम रहीम की 15वीं पैरोल पर उठी उंगली

उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत से इनकार पर विपक्ष ने सवाल उठाए, जबकि बलात्कारी गुरमीत राम रहीम को 15वीं बार पैरोल मिलने को चयनात्मक न्याय बताया गया।

दिल्ली दंगों की साजिश से जुड़े 2020 के मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किए जाने पर विपक्षी दलों ने कड़ी आपत्ति जताई है। विपक्ष ने सवाल उठाया है कि जहां एक ओर दोनों आरोपी बिना ट्रायल के पांच साल से अधिक समय से जेल में हैं, वहीं दूसरी ओर बलात्कार के दोषी डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम को बार-बार पैरोल दी जा रही है।

सोमवार (5 जनवरी 2026) को माकपा सांसद जॉन ब्रिटास ने The Indian Witness पर लिखा कि “जमानत नियम है और जेल अपवाद—यह सिद्धांत कुछ लोगों के मामले में लागू नहीं होता।” उन्होंने कहा कि उमर खालिद को कठोर यूएपीए के तहत पांच साल से अधिक समय से हिरासत में रखा गया है, जबकि अभी तक मुकदमा शुरू भी नहीं हुआ है। “प्री-ट्रायल जेल कोई सजा नहीं है”।

ब्रिटास ने यह भी कहा कि 2017 में दोषी ठहराए गए बलात्कारी और हत्यारे गुरमीत राम रहीम सिंह को एक बार फिर 40 दिन की पैरोल दी गई है, जो उनकी 15वीं अस्थायी रिहाई है। “एक बिना ट्रायल के अनिश्चितकाल तक जेल में है, दूसरा बार-बार ‘जेल वेकेशन’ का आनंद ले रहा है”।

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माकपा ने अपने बयान में कहा कि उमर खालिद और शरजील इमाम को लगातार जमानत से वंचित रखना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। पार्टी ने आरोप लगाया कि असहमति की आवाजों को दबाने के लिए यूएपीए का इस्तेमाल किया जा रहा है और यह चयनात्मक न्याय का उदाहरण है।

राजद सांसद मनोज झा ने भी जमानत से इनकार को “चिंताजनक” बताया। उन्होंने कहा कि यह सवाल उठता है कि संवैधानिक अधिकार सक्रिय होने से पहले किसी व्यक्ति को कितने समय तक जेल में रहना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार किया, लेकिन इसी मामले में पांच अन्य आरोपियों—गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा-उर-रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद—को जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि सभी आरोपियों की भूमिका समान नहीं है।

फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।

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