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भाषा के लिए विरोध ‘बीमारी’ है तो देश के ज़्यादातर राज्य इससे ग्रस्त हैं: राज ठाकरे का भागवत पर निशाना

राज ठाकरे ने कहा कि भाषा के लिए विरोध कोई बीमारी नहीं, बल्कि अधिकार है। उन्होंने भागवत और आरएसएस कार्यक्रम में उपस्थिति को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव का आरोप लगाया।

मुंबई, 10 फरवरी: महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने सोमवार को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के एक कथित बयान को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी। राज ठाकरे ने कहा कि यदि किसी की मातृभाषा और भाषा अधिकारों के लिए विरोध करना ‘बीमारी’ माना जाता है, तो देश के अधिकांश राज्य इस ‘बीमारी’ से पीड़ित हैं। उन्होंने यह टिप्पणी भाषा और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर बढ़ती बहस के बीच की।

राज ठाकरे ने कहा कि भारत की विविधता उसकी भाषाओं में निहित है और अलग-अलग राज्यों में अपनी भाषा, संस्कृति और पहचान को लेकर आंदोलन होते रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि भाषा के लिए आवाज़ उठाना कोई अस्वस्थ प्रवृत्ति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकार है। ठाकरे के अनुसार, यदि इसे बीमारी कहा जाए, तो तमिलनाडु, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र सहित कई राज्य इसके उदाहरण हैं, जहां लोग अपनी भाषाई अस्मिता को लेकर जागरूक और सक्रिय रहे हैं।

मनसे प्रमुख ने आरएसएस के शताब्दी समारोह को लेकर भी टिप्पणी की, जो 7-8 फरवरी को मुंबई में आयोजित किया गया था। राज ठाकरे का दावा है कि इस कार्यक्रम में शामिल होने वाले लोग आरएसएस प्रमुख के प्रति प्रेम या समर्थन के कारण नहीं आए थे, बल्कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के दबाव और भय के चलते उपस्थिति दर्ज कराई गई थी। उन्होंने कहा कि मौजूदा राजनीतिक माहौल में कई संस्थाएं और व्यक्ति सत्ता के प्रभाव में आकर कार्यक्रमों में भाग लेने को मजबूर होते हैं।

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राज ठाकरे की इस प्रतिक्रिया के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। भाषा, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों पर एक बार फिर बहस छिड़ गई है, जिससे आने वाले समय में राजनीतिक बयानबाज़ी और तेज़ होने की संभावना जताई जा रही है।

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