विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की गणना फॉर्म पर उठे सवाल, चुनावी नियमों के तहत फॉर्म-4 का उल्लंघन होने की आशंका
निर्वाचक पंजीकरण नियम 1960 के नियम 8 के तहत मतदाताओं का विवरण एकत्र करने के लिए फॉर्म-4 का प्रावधान है, लेकिन विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में प्रयुक्त गणना फॉर्म इस नियम से मेल नहीं खाता।
चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिविजन, SIR) के दौरान मतदाताओं से जानकारी एकत्र करने के लिए उपयोग किए जा रहे "एनुमेरेशन फॉर्म" पर अब कानूनी सवाल खड़े हो गए हैं। निर्वाचक पंजीकरण नियम (रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स), 1960 के नियम 8 के अनुसार, मतदाता सूचियों के किसी भी प्रकार के पुनरीक्षण के दौरान—चाहे वह विशेष सारांश पुनरीक्षण (स्पेशल समरी रिविजन) हो या विशेष गहन पुनरीक्षण—निर्वाचक पंजीकरण अधिकारियों (इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स) द्वारा मतदाताओं के विवरण एकत्र करने के लिए फॉर्म-4 जारी किया जाना अनिवार्य है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रावधान स्पष्ट रूप से निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 में दर्ज है और इसमें किसी भी प्रकार के पुनरीक्षण के लिए अलग से कोई छूट नहीं दी गई है। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि वर्तमान में विशेष गहन पुनरीक्षण के दौरान मतदाताओं से जानकारी जुटाने के लिए जो फॉर्म इस्तेमाल किया जा रहा है, वह नियमानुसार निर्धारित फॉर्म-4 से किस हद तक मेल खाता है। यदि एनुमेरेशन फॉर्म और फॉर्म-4 में अंतर पाया जाता है, तो यह सीधे तौर पर निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 8 का उल्लंघन माना जा सकता है।
यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि मतदाता सूचियों का पुनरीक्षण लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद है और इसमें प्रयुक्त होने वाले फॉर्म की वैधता सीधे तौर पर करोड़ों मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ी है। नियम 8 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूचियों में शामिल होने या बने रहने के लिए दी जाने वाली जानकारी एक समान, पूर्व-निर्धारित और कानूनी रूप से मान्य प्रारूप में ही एकत्र की जाए, ताकि प्रक्रिया में पारदर्शिता और एकरूपता बनी रहे।
विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया के तहत बूथ स्तर के अधिकारियों द्वारा घर-घर जाकर मतदाताओं से विवरण एकत्र किया जा रहा है, जिसके लिए एक निर्धारित फॉर्म का उपयोग किया जा रहा है। कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि यह फॉर्म निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के नियम 8 के तहत निर्धारित फॉर्म-4 के अनुरूप नहीं है, तो इससे पूरी पुनरीक्षण प्रक्रिया की वैधानिकता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। ऐसी स्थिति में मतदाता सूची से जुड़ी प्रक्रिया को न्यायिक समीक्षा के दायरे में लाए जाने की संभावना भी जताई जा रही है।
इस विषय पर चुनाव आयोग की ओर से अभी तक कोई औपचारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है कि गणना फॉर्म और फॉर्म-4 के बीच क्या विसंगति है या क्या दोनों एक ही हैं। विधि विशेषज्ञों का मानना है कि इस मुद्दे पर स्पष्टता आना जरूरी है ताकि विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों का समाधान हो सके और मतदाता सूचियों की शुद्धता तथा कानूनी वैधता सुनिश्चित हो सके।
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