सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गृहिणी के घरेलू श्रम का तय हुआ आर्थिक मूल्य, मुआवजे का नया आधार बना
सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणी के घरेलू और देखभाल संबंधी कार्य का न्यूनतम आर्थिक मूल्य 30,000 रुपये प्रतिमाह तय कर मोटर दुर्घटना मुआवजे का नया आधार निर्धारित किया।
देश की सर्वोच्च अदालत ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए गृहिणियों के घरेलू और देखभाल संबंधी कार्य को आर्थिक मान्यता दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी गृहिणी के अवैतनिक घरेलू श्रम और परिवार की देखभाल का न्यूनतम आर्थिक मूल्य 30,000 रुपये प्रति माह माना जाएगा। इसी आधार पर मोटर दुर्घटना में मृत्यु होने की स्थिति में आश्रितों को मुआवजा निर्धारित किया जाएगा।
यह महत्वपूर्ण फैसला 11 जून 2026 को सुनाया गया। मामला पंजाब में वर्ष 2001 में हुई एक सड़क दुर्घटना से जुड़ा था, जिसमें एक गृहिणी की मौत हो गई थी। अदालत ने कहा कि अब तक जिन महिलाओं की स्वतंत्र आय नहीं थी और जो केवल घर संभालने का कार्य करती थीं, उनके योगदान का उचित आर्थिक आकलन नहीं किया जाता था। यह स्थिति न्यायसंगत नहीं थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि घर का काम, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, भोजन तैयार करना तथा परिवार के दैनिक जीवन का संचालन जैसे कार्य भले ही वेतन के दायरे में नहीं आते हों, लेकिन उनका आर्थिक और सामाजिक महत्व अत्यंत बड़ा है। इसलिए इन सेवाओं को मुआवजे की गणना में शामिल किया जाना चाहिए।
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि भारत में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू और देखभाल संबंधी कार्य का योगदान देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 15 प्रतिशत माना जाता है। इसके बावजूद इस श्रम का अब तक कोई औपचारिक आर्थिक मूल्य निर्धारित नहीं किया गया था।
मोटर थर्ड पार्टी (टीपी) बीमा का उद्देश्य सड़क दुर्घटना में किसी तीसरे पक्ष को हुई मृत्यु, चोट या अन्य कानूनी क्षति की भरपाई करना है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद गृहिणियों की मृत्यु से जुड़े मोटर दुर्घटना मामलों में मुआवजे की गणना अधिक न्यायसंगत और वास्तविक आधार पर की जा सकेगी। इस निर्णय को महिलाओं के अवैतनिक श्रम को कानूनी और आर्थिक मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।