शिवसेना से एआईएडीएमके तक: दलों में बगावत की लड़ाइयों का इतिहास, टीएमसी में नई टूट से बढ़ी सियासी हलचल
टीएमसी में कथित बगावत के बीच 59 विधायकों के समर्थन का दावा किया गया है। इससे पार्टी और चुनाव चिन्ह पर दावे की चर्चा तेज हो गई है।
पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में कथित बगावत के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। रिपोर्टों के अनुसार, पार्टी से निष्कासित नेताओं ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को लगभग 59 विधायकों का समर्थन प्राप्त है। ऋतब्रत बनर्जी ने नाराज विधायकों के हस्ताक्षर वाला पत्र पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष को सौंप दिया है।
हालिया विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 80 सीटें जीती थीं। भारत के दल-बदल विरोधी कानून के अनुसार किसी भी राजनीतिक दल में वैध विभाजन के लिए उसके कम से कम दो-तिहाई विधायकों का समर्थन आवश्यक होता है। टीएमसी के मामले में यह संख्या 54 विधायकों की है। ऐसे में यदि 59 विधायक अलग गुट बनाते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से संरक्षण मिल सकता है और वे पार्टी के नाम व चुनाव चिन्ह पर भी दावा ठोक सकते हैं।
भारतीय राजनीति में किसी पार्टी और उसके चुनाव चिन्ह पर दावा करने की यह पहली लड़ाई नहीं है। इससे पहले भी कई बड़े दलों में टूट के बाद मामला विधानसभा अध्यक्ष, चुनाव आयोग और अदालतों तक पहुंच चुका है।
शिवसेना में वर्ष 2022 में बड़ा विभाजन हुआ था, जब एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ बगावत कर दी। बाद में चुनाव आयोग ने शिंदे गुट को असली शिवसेना और पार्टी का चुनाव चिन्ह सौंप दिया।
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में 2023 में अजित पवार और शरद पवार के बीच विभाजन हुआ। 2024 में चुनाव आयोग ने अजित पवार गुट को आधिकारिक एनसीपी के रूप में मान्यता दी।
तमिलनाडु की अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एआईएडीएमके) में ओ. पन्नीरसेल्वम और एडप्पडी के. पलानीस्वामी के बीच नेतृत्व संघर्ष हुआ। अदालत और पार्टी संगठन के समर्थन से पलानीस्वामी का पक्ष मजबूत हुआ।
वहीं लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) में चिराग पासवान और पशुपति कुमार पारस के बीच विभाजन हुआ। हालांकि चुनाव चिन्ह फ्रीज होने के कारण दोनों गुटों को अलग-अलग प्रतीक दिए गए।
टीएमसी में मौजूदा घटनाक्रम अब पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण मोड़ बन सकता है।