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तख्तापलट की साजिश से हिला बेनिन, विधायी चुनावों में मतदान

तख्तापलट की नाकाम कोशिश के बाद बेनिन में संसदीय चुनाव हो रहे हैं। राष्ट्रपति टालोन का गठबंधन मजबूत स्थिति में है, जबकि विपक्ष कमजोर और चुनावी नियमों से जूझ रहा है।

पश्चिम अफ्रीकी देश बेनिन में तख्तापलट की नाकाम कोशिश के एक महीने बाद रविवार (11 जनवरी 2026) को संसदीय और स्थानीय चुनाव कराए जा रहे हैं। ये चुनाव अप्रैल में होने वाले राष्ट्रपति चुनावों से पहले देश की राजनीतिक दिशा तय करेंगे।

राष्ट्रपति पैट्रिस टालोन के नेतृत्व वाला सत्तारूढ़ गठबंधन इन चुनावों में अपनी स्थिति और मजबूत करता दिख रहा है। मुख्य विपक्षी दल ‘डेमोक्रेट्स’ को स्थानीय चुनावों और अप्रैल में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव से बाहर कर दिया गया है, क्योंकि वह पंजीकरण के लिए आवश्यक हस्ताक्षर जुटाने में विफल रहा। हालांकि डेमोक्रेट्स संसदीय चुनावों में हिस्सा ले रहे हैं, लेकिन उन्हें टालोन के तीन-दलीय गठबंधन के मुकाबले और सीटें गंवाने का खतरा है, जिसके पास फिलहाल नेशनल असेंबली की 109 में से 81 सीटें हैं।

ये चुनाव ऐसे समय में हो रहे हैं, जब 7 दिसंबर 2025 को सेना के विद्रोही गुट द्वारा किए गए तख्तापलट के प्रयास से देश अभी उबर ही रहा है। इस प्रयास को कुछ ही घंटों में सेना ने नाइजीरिया और फ्रांस के समर्थन से नाकाम कर दिया था।

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67 वर्षीय राष्ट्रपति टालोन के शासन में बीते लगभग एक दशक में आर्थिक विकास हुआ है, लेकिन आलोचकों का आरोप है कि उन्होंने राजनीतिक विपक्ष और नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित किया है। सुरक्षा भी मतदाताओं के लिए एक अहम मुद्दा है, क्योंकि उत्तरी बेनिन में पड़ोसी बुर्किना फासो और नाइजर से अल-कायदा से जुड़े आतंकी समूहों की हिंसा का असर पड़ा है।

टालोन अपने दूसरे कार्यकाल के अंत में हैं और अप्रैल में चुनाव नहीं लड़ सकते। उनके पसंदीदा उत्तराधिकारी, वित्त मंत्री रोमुआल्द वडाग्नी, राष्ट्रपति पद के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं। उनका मुकाबला मध्यमार्गी विपक्षी नेता पॉल हौंकपे से होगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि मौजूदा चुनाव कानून विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती है। नियमों के अनुसार, संसद में उतरने के लिए हर पार्टी को देश के 24 मतदान क्षेत्रों में पंजीकृत मतदाताओं के 20 प्रतिशत का समर्थन जुटाना जरूरी है, जो विपक्ष के लिए लगभग असंभव माना जा रहा है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने चुनाव से पहले चेतावनी दी है कि देश में नागरिक स्वतंत्रताएं सिमट रही हैं और स्वतंत्र मीडिया पर हमले बढ़े हैं, हालांकि सत्तारूढ़ दल इन आरोपों को खारिज करता है।

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