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सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर रोक भेदभाव नहीं, परंपरा से जुड़ी: केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि सबरीमाला में महिलाओं पर रोक भेदभाव नहीं, बल्कि परंपरा से जुड़ी है। अब नौ-न्यायाधीशों की पीठ इस मामले पर अंतिम सुनवाई करेगी।

केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। केंद्र ने स्पष्ट किया कि 10 से 50 वर्ष की आयु की महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध किसी प्रकार के भेदभाव या अशुद्धता की धारणा पर आधारित नहीं है, बल्कि यह भगवान अयप्पा की ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ परंपरा और मंदिर की स्थापित धार्मिक विधियों को बनाए रखने के उद्देश्य से है।

केंद्र सरकार ने अपनी लिखित दलील में कहा कि यदि इस आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी जाती है, तो इससे पूजा-पद्धति की मूल संरचना और देवता के पारंपरिक स्वरूप पर असर पड़ सकता है। यह धार्मिक विविधता के उस सिद्धांत को भी प्रभावित कर सकता है, जिसे भारतीय संविधान द्वारा संरक्षण प्राप्त है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ 7 अप्रैल से अंतिम सुनवाई शुरू करेगी। यह पीठ न केवल सबरीमाला मंदिर, बल्कि अन्य धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े व्यापक मुद्दों पर भी विचार करेगी।

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सुनवाई से पहले अखिल भारतीय संत समिति ने भी हस्तक्षेप की अनुमति मांगी है। संगठन का कहना है कि अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि कौन-सी धार्मिक प्रथाएं आवश्यक हैं, क्योंकि यह आस्था से जुड़ा विषय है।

यह विवाद सितंबर 2018 से जुड़ा है, जब सुप्रीम कोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 बहुमत से महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी को हटा दिया था। अदालत ने उस समय कहा था कि यह परंपरा महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।

अब नई पीठ धार्मिक परंपराओं और समानता के अधिकार के बीच संतुलन पर फैसला करेगी।

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