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उच्च शिक्षा के अतिविस्तार से संकट की स्थिति, सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उच्च शिक्षा के अतिविस्तार और निजीकरण से संकट पैदा हुआ है। अदालत ने फैकल्टी पद चार महीने में और कुलपति-रजिस्ट्रार की नियुक्ति एक महीने में करने के निर्देश दिए।

सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षा व्यवस्था में “मासिफिकेशन” यानी अतिविस्तार और निजीकरण को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि इन दोनों प्रवृत्तियों ने भारत को छात्र नामांकन के मामले में दुनिया में दूसरे स्थान पर तो पहुंचा दिया है, लेकिन इसके साथ ही मौतों, मानसिक तनाव, संस्थानों में भारी रिक्तियों और शोषण की एक लंबी श्रृंखला भी सामने आई है। शीर्ष अदालत के अनुसार, यह स्थिति उच्च शिक्षा प्रणाली में एक तरह की “संकट की महामारी” को जन्म दे रही है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी पूर्ण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए 38 पन्नों के आदेश में कई अहम निर्देश जारी किए। अदालत ने कहा कि देश के सार्वजनिक और निजी, दोनों प्रकार के उच्च शिक्षा संस्थानों (HEIs) में खाली पड़े शिक्षकों के पदों को चार महीने के भीतर अनिवार्य रूप से भरा जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कुलपति (वाइस-चांसलर) और रजिस्ट्रार जैसे शीर्ष प्रशासनिक पदों पर नियुक्तियां, पद खाली होने के एक महीने के भीतर की जानी चाहिए। अदालत ने इसे एक नियमित और अनिवार्य प्रक्रिया के रूप में अपनाने पर जोर दिया, ताकि संस्थानों में प्रशासनिक शून्यता न बने।

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अदालत ने अपने आदेश में कहा कि उच्च शिक्षा का तेजी से विस्तार बिना पर्याप्त बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित फैकल्टी और प्रशासनिक स्थिरता के किया गया, जिससे छात्रों और शिक्षकों दोनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है। इसका नतीजा मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं, शैक्षणिक गुणवत्ता में गिरावट और संस्थागत अव्यवस्था के रूप में सामने आ रहा है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि समयबद्ध ढंग से इन निर्देशों का पालन नहीं किया गया, तो शिक्षा व्यवस्था की साख और छात्रों का भविष्य दोनों ही खतरे में पड़ सकते हैं। अदालत के ये निर्देश देश की उच्च शिक्षा प्रणाली में सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।

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