एम्स की मानसिक स्वास्थ्य परियोजना से दिल्ली की झुग्गी में रहने वाली 19 वर्षीय युवती को नई ज़िंदगी: क्या यह पहल किशोरों को अवसाद से बचा सकती है?
एम्स की मानसिक स्वास्थ्य परियोजना से दिल्ली की 19 वर्षीय भूमि सिंह ने पढ़ाई और आत्मविश्वास दोबारा पाया, जिससे किशोरों को अवसाद से बचाने की उम्मीद जगी है।
दिल्ली के मंगोलपुरी इलाके की एक संकरी-सी झुग्गी में बैठी 19 वर्षीय भूमि सिंह आज आत्मविश्वास के साथ अपने भविष्य की योजनाओं के बारे में बात कर रही हैं। वह बताती हैं कि उन्होंने अपने जीवन के एक कठिन और लगभग खोए हुए साल की भरपाई कर ली है और अब कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षा की तैयारी में जुटी हैं। भूमि का लक्ष्य अच्छे अंक हासिल कर किसी व्यावसायिक कोर्स में दाख़िला लेना है, ताकि वह जल्द ही नौकरी के लिए तैयार हो सकें।
भूमि उन सैकड़ों किशोरों में से एक हैं, जिन्हें एम्स (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) की मानसिक स्वास्थ्य परियोजना से मदद मिली है। यह परियोजना खास तौर पर कमजोर और वंचित इलाकों में रहने वाले किशोरों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा सुरक्षित माहौल और सहयोग प्रदान करने के लिए शुरू की गई है।
भूमि बताती हैं कि उनके परिवार में अब भी मतभेद बने हुए हैं, लेकिन दो करीबी दोस्त उनके लिए सहारा बन गए हैं। “हम तीनों दिल्ली पुलिस पब्लिक लाइब्रेरी में साथ पढ़ाई करते हैं। हम एक-दूसरे की समस्याएं साझा करते हैं और मिलकर समाधान खोजते हैं। तमाम परेशानियों के बावजूद हमें ही अपने जीवन की ज़िम्मेदारी उठानी होगी”।
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विशेषज्ञों के अनुसार, 50 प्रतिशत से अधिक मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं 14 वर्ष की उम्र से पहले ही शुरू हो जाती हैं। ऐसे में किशोरों के लिए सुरक्षित माहौल, संवाद और समय पर सहायता बेहद ज़रूरी है। एम्स की यह पहल इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है, जो न केवल अवसाद से जूझ रहे युवाओं को सहारा देती है, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भर और सकारात्मक भविष्य की ओर भी ले जाती है।
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