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अमित शाह का शून्य आपदा मृत्यु का लक्ष्य, इसरो की चेतावनियां बता रही हैं हिमालय के बढ़ते खतरे

अमित शाह ने आपदा प्रबंधन में शून्य मृत्यु का लक्ष्य रखा। इस बीच इसरो की रिपोर्ट हिमालयी ग्लेशियर झीलों के बढ़ते खतरे और चेतावनी के बाद कार्रवाई की जरूरत बताती है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भारत के लिए आपदाओं के दौरान “शून्य मृत्यु” का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। नई दिल्ली में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआईडीएम) की गवर्निंग बॉडी की तीसरी बैठक की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार में देश की आपदा प्रबंधन नीति में व्यापक बदलाव आया है।

अमित शाह के मुताबिक, भारत अब केवल राहत और पुनर्वास पर निर्भर व्यवस्था से आगे बढ़कर जोखिम कम करने, प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली और शून्य मृत्यु पर केंद्रित मॉडल की ओर बढ़ चुका है। उन्होंने कहा कि कई हालिया आपदाओं में समय रहते चेतावनी और बेहतर समन्वय से जानमाल के नुकसान को रोका गया है।

हालांकि, यह लक्ष्य हिमालयी क्षेत्र में एक बड़ी चुनौती भी सामने रखता है। अप्रैल 2024 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने चार दशकों के उपग्रह आंकड़ों के आधार पर हिमालयी ग्लेशियर झीलों के तेजी से विस्तार की चेतावनी दी थी। 1984 से 2023 के बीच 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियर झीलों में से 676 का आकार काफी बढ़ा। इनमें 130 झीलें भारत में हैं। इनमें 65 सिंधु, सात गंगा और 58 ब्रह्मपुत्र बेसिन में स्थित हैं।

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इनमें से 601 झीलों का आकार दोगुने से अधिक हो चुका है। हिमाचल प्रदेश की घेपांग घाटी झील का क्षेत्रफल 1989 से 2022 के बीच 178 प्रतिशत बढ़कर 36.49 से 101.30 हेक्टेयर हो गया।

केदारनाथ आपदा, सिक्किम में दक्षिण ल्होनक झील से आई बाढ़ और 2021 की चमोली आपदा हिमालय की संवेदनशीलता का उदाहरण हैं।

इसरो के अनुसार, हिमालय में तेजी से बदलती परिस्थितियों के कारण ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (जीएलओएफ) का खतरा बढ़ रहा है। ऐसे में उपग्रह निगरानी, रियल-टाइम चेतावनी, जोखिम मानचित्रण, निकासी अभ्यास और मजबूत बुनियादी ढांचे को जरूरी बनाया जाना होगा।

भारत मौसम विज्ञान विभाग की चक्रवात चेतावनी प्रणाली ने भी आपदा प्रबंधन में प्रभावी परिणाम दिए हैं। इसी तरह 2004 के बाद स्थापित भारतीय सुनामी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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