बसंत उत्सव: त्रिपुरा के राजदरबार ने कैसे गढ़ी शांतिनिकेतन की वसंत परंपरा
शांतिनिकेतन के बसंत उत्सव को आकार देने में त्रिपुरा के राजदरबार की अहम भूमिका रही। राजपरिवार ने विश्वभारती को सहयोग दिया और मणिपुरी नृत्य परंपरा से कार्यक्रम समृद्ध हुआ।
शांतिनिकेतन का बसंत उत्सव लंबे समय से गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की अनूठी देन माना जाता रहा है। यह ऐसा वसंत पर्व है, जहां सड़कों की होली के शोर-शराबे की जगह संगीत, नृत्य और रंगों की सौम्य छटा देखने को मिलती है। लेकिन इस परंपरा की कहानी में त्रिपुरा का योगदान अक्सर अनदेखा रह जाता है।
पूर्वोत्तर का छोटा सा राज्य त्रिपुरा, जो कभी एक स्वतंत्र रियासत था, संगीत और वैष्णव भक्ति की समृद्ध परंपरा के लिए प्रसिद्ध रहा है। त्रिपुरा के राजपरिवार ने शांतिनिकेतन और विश्वभारती विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक और संस्थागत विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लगभग पचास वर्षों तक त्रिपुरा के शाही परिवार ने विश्वभारती को आर्थिक सहयोग प्रदान किया।
इतना ही नहीं, त्रिपुरा दरबार ने प्रशिक्षित मणिपुरी नर्तकों को शांतिनिकेतन भेजा, जिन्होंने वहां के पाठ्यक्रम और सांस्कृतिक गतिविधियों को नई दिशा दी। मणिपुरी नृत्य शैली का प्रभाव रवींद्रनाथ ठाकुर की रचनाओं और नृत्य-नाट्यों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
इस वर्ष 6 मार्च को विश्वभारती विश्वविद्यालय में आयोजित होने वाले बसंत उत्सव में ठाकुर के नृत्य-नाटक ‘नटीर पूजा’ का मंचन किया जाएगा। यह वही कृति है, जिसका आयोजन कभी शांतिनिकेतन में नवकुमार सिंह ने किया था। नवकुमार सिंह का संबंध भी त्रिपुरा के राजपरिवार से था, जिसने इस सांस्कृतिक आदान-प्रदान को और गहरा किया।
सितंबर 2023 में जब शांतिनिकेतन को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में भारत की 41वीं धरोहर के रूप में शामिल किया गया, तब इस साझा सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मान्यता मिली। यह सम्मान केवल बंगाल ही नहीं, बल्कि अगरतला में विकसित उस सांस्कृतिक परंपरा की भी स्वीकृति है, जिसने शांतिनिकेतन को आकार देने में योगदान दिया।
इस प्रकार बसंत उत्सव केवल रवींद्रनाथ ठाकुर की कल्पना का परिणाम नहीं, बल्कि त्रिपुरा और शांतिनिकेतन के गहरे सांस्कृतिक संबंधों की जीवंत अभिव्यक्ति भी है।
और पढ़ें: सूरत के वृद्धाश्रम में उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने मनाई होली, बुजुर्गों संग बांटी खुशियां