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राम मंदिर ट्रस्ट ने चंपत राय का इस्तीफा स्वीकार किया, कृष्ण मोहन बने अंतरिम महासचिव

राम मंदिर ट्रस्ट ने चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार कर लिए। कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव बनाया गया, जबकि एसआईटी जांच जारी है।

उत्तर प्रदेश के अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने राम मंदिर में कथित दान गबन मामले के बीच बड़ा फैसला लेते हुए ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय और ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा के इस्तीफे स्वीकार कर लिए हैं। यह निर्णय सोमवार को ट्रस्ट की महत्वपूर्ण बैठक में लिया गया। साथ ही कृष्ण मोहन को अंतरिम महासचिव नियुक्त किया गया है।

बैठक के बाद ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरी महाराज ने मीडिया से बातचीत में कहा कि दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की जा रही है। उन्होंने लोगों से शांति और संयम बनाए रखने की अपील की तथा बिना नाम लिए विपक्षी दलों पर इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया।

उन्होंने बताया कि 22 जुलाई को ट्रस्ट की अगली बैठक आयोजित होगी, जिसमें विशेष जांच दल (एसआईटी) की अंतिम रिपोर्ट पर चर्चा की जाएगी। इसी बैठक में नए ट्रस्टियों की नियुक्ति सहित अन्य प्रशासनिक निर्णय भी लिए जाएंगे।

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गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा गठित एसआईटी इस पूरे मामले की जांच कर रही है। जांच के दौरान आठ आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें चंपत राय के करीबी सहयोगी रामाशंकर उर्फ टिन्नू यादव भी शामिल हैं। एसआईटी और अयोध्या पुलिस ने आरोपियों के घरों से नकदी बरामद की है। साथ ही डिलीट किए गए सीसीटीवी फुटेज भी हासिल किए गए हैं, जिनमें कथित तौर पर मंदिर परिसर से नोट बाहर ले जाते हुए आरोपी दिखाई दे रहे हैं।

हालांकि, चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा से पूछताछ की जा चुकी है, लेकिन अब तक उनके खिलाफ कोई प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज नहीं की गई है।

बैठक में ट्रस्ट के अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल दास समेत अधिकांश सदस्य मौजूद रहे, जबकि चंपत राय और डॉ. अनिल मिश्रा अपने इस्तीफे पर चर्चा होने के कारण बैठक में शामिल नहीं हुए। बैठक से पहले महंत नृत्य गोपाल दास ने कहा था कि दान चोरी की घटना से उन्हें गहरा दुख पहुंचा है और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा मिलनी चाहिए। उन्होंने यह भी अपील की कि इस मामले को राजनीतिक रंग न दिया जाए।

ट्रस्ट ने दावा किया है कि उसकी वित्तीय व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है, जबकि एसआईटी पिछले पांच वर्षों के ऑडिट रिकॉर्ड की भी जांच करने पर विचार कर रही है।

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