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बंगाल चुनाव में कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन पर असमंजस, दोनों क्यों फंसे हैं कैच-22 में

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और लेफ्ट विधानसभा चुनाव से पहले गठबंधन को लेकर दुविधा में हैं, जहां एक ओर दीर्घकालिक पुनरुत्थान और दूसरी ओर राजनीतिक अस्तित्व की चिंता है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति में पिछले कई वर्षों से सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और मुख्य विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच सीधी लड़ाई देखने को मिल रही है। इस बदलते राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस और सीपीआई(एम) के नेतृत्व वाला वाम मोर्चा खुद को हाशिये पर महसूस कर रहे हैं। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर दोनों दल एक बार फिर गठबंधन को लेकर दुविधा में फंसे नजर आ रहे हैं।

राज्य कांग्रेस के एक वर्ग का मानना है कि पार्टी को अल्पकालिक राजनीतिक फायदे के बजाय दीर्घकालिक संगठनात्मक पुनरुत्थान पर ध्यान देना चाहिए। इस सोच के तहत यह धड़ा चाहता है कि कांग्रेस आगामी विधानसभा चुनाव, जो मार्च-अप्रैल में प्रस्तावित हैं, अकेले लड़े। उनका तर्क है कि बार-बार गठबंधन करने से पार्टी की स्वतंत्र पहचान कमजोर होती जा रही है और जमीनी स्तर पर संगठन मजबूत नहीं हो पा रहा।

दूसरी ओर, वाम दलों के भीतर भी कांग्रेस के साथ हाथ मिलाने को लेकर संशय है। वाम नेताओं का एक वर्ग कांग्रेस को ‘बोझ’ के रूप में देखता है और मानता है कि उसके साथ गठबंधन से अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं मिल पा रहा। पिछले चुनावों के अनुभवों को देखते हुए वाम दल यह भी सोच रहे हैं कि क्या कांग्रेस के साथ गठबंधन से उनका जनाधार बढ़ेगा या और सिमटेगा।

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इस स्थिति ने कांग्रेस और वाम दलों को एक तरह के ‘कैच-22’ में डाल दिया है। यदि वे साथ आते हैं तो उन्हें सीमित लाभ और पहचान के संकट का डर है, और यदि अलग-अलग लड़ते हैं तो टीएमसी-भाजपा के द्विध्रुवीय मुकाबले में और कमजोर पड़ने का खतरा है।

कुल मिलाकर, बंगाल चुनाव से पहले कांग्रेस और लेफ्ट दोनों ही यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि गठबंधन उनके लिए संजीवनी साबित होगा या राजनीतिक बोझ।

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