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पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत के बाद बदलते भारत-बांग्लादेश संबंध, सीमा बाड़बंदी से तीस्ता समझौते तक नई समीकरणें

पश्चिम बंगाल में भाजपा की जीत और बांग्लादेश में बीएनपी सरकार बनने के बाद भारत-बांग्लादेश संबंधों में नई कूटनीतिक दिशा दिख रही है, जिसमें तीस्ता समझौता और सीमा सुरक्षा अहम मुद्दे बन गए हैं।

पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ऐतिहासिक जीत के बाद भारत और बांग्लादेश के संबंधों में बड़े बदलाव की संभावना दिखाई दे रही है। 4 मई को भाजपा ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के 15 साल पुराने शासन को समाप्त करते हुए 294 में से 207 सीटों पर जीत दर्ज की। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बदलाव का असर नई दिल्ली और ढाका के रिश्तों पर भी पड़ेगा।

पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के कार्यकाल में भारत-बांग्लादेश संबंध काफी मजबूत माने जाते थे, लेकिन मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाले अंतरिम प्रशासन के दौरान दोनों देशों के संबंधों में तनाव बढ़ गया था। अब बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) और पश्चिम बंगाल में भाजपा की सत्ता से रिश्तों को फिर से पटरी पर लाने की उम्मीद जगी है।

सबसे बड़ा मुद्दा गंगा जल बंटवारा संधि का है, जिसकी अवधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है। बीएनपी ने साफ कहा है कि भारत के साथ भविष्य के संबंध नई जल संधि पर निर्भर करेंगे। बांग्लादेश के मंत्री मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने नई दिल्ली से जल्द वार्ता की मांग की है।

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इसके अलावा तीस्ता जल बंटवारा समझौते पर भी चर्चा तेज हो गई है। पहले ममता बनर्जी ने इसका विरोध किया था, लेकिन भाजपा सरकार के आने के बाद ढाका को उम्मीद है कि समझौते को फिर से आगे बढ़ाया जा सकता है।

सीमा सुरक्षा भी दोनों देशों के बीच बड़ा मुद्दा बन गई है। पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने बांग्लादेश सीमा पर बाड़बंदी के लिए बीएसएफ को 27 किलोमीटर जमीन देने की घोषणा की है। भाजपा का कहना है कि इससे घुसपैठ रुकेगी और सुरक्षा मजबूत होगी।

हालांकि, बांग्लादेश ने आशंका जताई है कि कड़ी सीमा निगरानी से सीमा क्षेत्रों की अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और स्थानीय लोगों के जीवन पर असर पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले वर्षों में दोनों देशों के रिश्ते नई राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार तय होंगे।

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