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छोटी शुरुआत, बड़ा प्रभाव: अंके गौड़ा से शुभा अयंगर तक, कर्नाटक के पद्मश्री विजेताओं की प्रेरक कहानियां

कर्नाटक के पद्मश्री विजेताओं की कहानियां दिखाती हैं कि छोटे प्रयास, दृढ़ संकल्प और सेवा भावना से समाज में दूरगामी और स्थायी बदलाव संभव है।

गणतंत्र दिवस 2026 के अवसर पर घोषित कर्नाटक के पद्मश्री सम्मानितों की जीवन यात्राएं इस बात की सशक्त मिसाल हैं कि सामाजिक बदलाव अक्सर शांत संकल्प और निरंतर प्रयासों से शुरू होता है। अंके गौड़ा, शुभा अयंगर, डॉ. सुरेश हनगवाड़ी, टी. टी. जगन्नाथन, एस. जी. सुशीलेम्मा सहित राज्य के कई सम्मानित व्यक्तियों ने व्यक्तिगत संघर्षों को आजीवन मिशन में बदलकर देश की सेवा की।

इन पद्मश्री पुरस्कार विजेताओं की कहानियां बताती हैं कि सीमित संसाधन भी यदि मजबूत इच्छाशक्ति से जुड़ जाएं, तो उनका प्रभाव पीढ़ियों तक कायम रहता है। किसी ने किताबों की कमी को महसूस कर दुनिया के सबसे बड़े निःशुल्क पुस्तकालयों में से एक की नींव रखी, तो किसी ने तीन अनाथ बच्चों को भोजन कराने की छोटी पहल को पूरे राज्य में फैलने वाले सामाजिक आंदोलन में बदल दिया।

अंके गौड़ा की कहानी विशेष रूप से प्रेरणादायक है। कॉलेज के दिनों में किताबों की कमी झेलने वाले अंके गौड़ा ने यह संकल्प लिया कि भविष्य में किसी विद्यार्थी को पढ़ने के लिए पुस्तकें न तरसना पड़े। एक समय बस कंडक्टर के रूप में काम करने वाले गौड़ा ने अपने जीवन का उद्देश्य एक विशाल पुस्तकालय बनाना तय किया। पांच दशकों की अथक मेहनत के बाद, आज उनके पुस्तकालय में 20 लाख से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं, जो सभी के लिए निःशुल्क हैं।

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इसी तरह, अन्य पद्मश्री विजेताओं ने शिक्षा, समाजसेवा, महिला सशक्तिकरण और संस्कृति के क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है। इन सभी की यात्राएं यह संदेश देती हैं कि बड़ा बदलाव शोर से नहीं, बल्कि निरंतर और निस्वार्थ कर्म से आता है

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