विचारधारा, सत्ता विरोधी लहर और ध्रुवीकरण: 2026 में नजर रखने योग्य प्रमुख भारतीय चुनाव
2026 के विधानसभा चुनावों में भाजपा दक्षिण में विस्तार की कोशिश करेगी, जबकि विपक्ष सत्ता विरोधी लहर, भाषा, केंद्र-राज्य संबंध और ध्रुवीकरण जैसे मुद्दों पर मुकाबला करेगा।
भारत जैसे ही राजनीतिक रूप से बेहद अहम वर्ष 2026 की ओर बढ़ रहा है, चार प्रमुख राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों को लेकर देश की राजनीति में हलचल तेज है और सभी दल अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देने में जुटे हैं। 2026 के चुनावों में चुनावी विश्वसनीयता एक केंद्रीय मुद्दे के रूप में उभरती दिख रही है।
सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) इन चुनावों को अपनी जीत की लय बनाए रखने के अवसर के रूप में देख रही है। पार्टी का लक्ष्य दक्षिण भारत में अपनी राजनीतिक पकड़ को और मजबूत करना है, जहां उसे अब तक अपेक्षित सफलता नहीं मिल पाई है। दूसरी ओर, बिखरा हुआ विपक्ष भाजपा की चुनावी मशीनरी को रोकने के लिए साझा मुद्दों और रणनीतियों की तलाश में है।
इन चुनावों में सत्ता विरोधी लहर (इनकम्बेंसी) एक अहम कारक साबित हो सकती है। जिन राज्यों में लंबे समय से एक ही दल या गठबंधन सत्ता में है, वहां जनता के मूड की परीक्षा होगी। इसके अलावा भाषा की राजनीति, केंद्र और राज्यों के बीच संबंध, प्रवासन (माइग्रेशन) से जुड़े सवाल और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण जैसे मुद्दे चुनावी बहस के केंद्र में रह सकते हैं।
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विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 के चुनाव केवल राज्य सरकारों के गठन तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ये 2029 के आम चुनावों की दिशा और दशा भी तय कर सकते हैं। भाजपा जहां अपने संगठनात्मक ढांचे और वैचारिक एजेंडे के बल पर आगे बढ़ने की कोशिश करेगी, वहीं विपक्ष के लिए एकजुटता और विश्वसनीय विकल्प पेश करना सबसे बड़ी चुनौती होगी।
कुल मिलाकर, 2026 के विधानसभा चुनाव भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद अहम माने जा रहे हैं, जिनमें विचारधारा, शासन का रिकॉर्ड और सामाजिक ध्रुवीकरण निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
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