×
 

जाति गणना के लिए भाषाई और सांस्कृतिक संकेत हो सकते हैं निर्णायक: प्रो. जी. एन. देवि

प्रो. जी. एन. देवि ने भाषाई और सांस्कृतिक संकेतों के आधार पर जातियों की सटीक गणना करने का सुझाव दिया, जिससे डिनोटिफाइड ट्राइब्स सहित सभी समूह शामिल होंगे।

प्रसिद्ध विद्वान, भाषाविद और सांस्कृतिक कार्यकर्ता प्रोफेसर जी. एन. देवि ने कहा है कि आगामी जनगणना में जातियों की सही गणना के लिए भाषाई और सांस्कृतिक संकेत निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने The Indian Witness से विशेष बातचीत में बताया कि अगर डिनोटिफाइड ट्राइब्स (पूर्व में ‘क्रिमिनल’ ट्राइब्स) को अलग से गणना करने का अवसर नहीं लिया गया, तो यह दस करोड़ से अधिक लोगों को अलग-थलग कर सकता है।

प्रो. देवि ने समझाया कि भले ही लोग अपनी जाति का नाम दर्ज करते समय अपनी समझ के अनुसार लिखें, लेकिन बाद में किए गए अध्ययन और सावधानीपूर्वक विश्लेषण से भाषा, पूर्वज, जीवनशैली और रिश्तेदारी के संकेतों के आधार पर सभी जातियों की व्यापक सूची तैयार की जा सकती है। इससे नामों की पुनरावृत्ति, भिन्नता और वर्तनी के अंतर को भी समझा जा सकेगा।

उन्होंने कहा, “इस मॉडल का भाषाओं के लिए परीक्षण और अनुभव किया जा चुका है।” प्रो. देवि के नेतृत्व में चल रहे “पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया” प्रोजेक्ट ने देश की 780 से अधिक भाषाओं का दस्तावेजीकरण किया। उनका सुझाव है कि इसी तरह के बहु-स्तरीय और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जाति गणना को भी प्रभावी ढंग से किया जा सकता है।

और पढ़ें: भारत-ग्रीस रक्षा सहयोग पर जोर, रक्षा मंत्रियों की नई दिल्ली में बैठक

विशेषज्ञों का मानना है कि यह विधि केवल आंकड़ों को इकट्ठा करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विविधताओं को भी सही तरीके से प्रतिबिंबित करेगी। प्रो. देवि का यह सुझाव जाति सर्वेक्षण और सामाजिक न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

और पढ़ें: यू.के. विदेश कार्यालय ने एपस्टीन से जुड़े पूर्व राजदूत के वेतन भुगतान की समीक्षा शुरू की

 
 
 
Gallery Gallery Videos Videos Share on WhatsApp Share