एक देश, एक चुनाव 2029 में संभव? जेपीसी अध्यक्ष बोले- 99% हितधारक प्रस्ताव के समर्थन में
एक देश, एक चुनाव को लेकर जेपीसी में चर्चा तेज है। अध्यक्ष पीपी चौधरी ने 99 प्रतिशत हितधारकों के समर्थन का दावा किया और राजनीतिक इच्छाशक्ति होने पर 2029 में लागू होने की संभावना जताई।
एक देश, एक चुनाव पर बढ़ी हलचल
‘एक देश, एक चुनाव’ यानी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने के प्रस्ताव को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। सोमवार को प्रस्ताव की जांच कर रही संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की अहम बैठक हुई। समिति के अध्यक्ष पीपी चौधरी ने दावा किया कि अब तक जिन हितधारकों से चर्चा हुई है, उनमें करीब 99 प्रतिशत ने एक साथ चुनाव कराने के प्रस्ताव का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति होने पर इसे 2029 में लागू किया जा सकता है।
बैठक में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा, पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम, तृणमूल कांग्रेस सांसद सागरिका घोष और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले समेत कई सदस्य शामिल हुए।
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जेपीसी फिलहाल 129वें संविधान संशोधन विधेयक की जांच कर रही है। इसका उद्देश्य लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का रास्ता तैयार करना है। विपक्षी दल इस प्रस्ताव का विरोध करते हुए संघीय ढांचे और राज्य सरकारों की स्वायत्तता पर संभावित असर की चिंता जता रहे हैं।
1952 से 1967 तक साथ हुए थे चुनाव
भारत में पहले भी लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते थे। 1952, 1957, 1962 और 1967 में दोनों चुनाव एक साथ हुए थे। हालांकि, 1967 के बाद कई राज्यों की विधानसभाएं समय से पहले भंग होने और राष्ट्रपति शासन लागू होने के कारण चुनावी चक्र टूट गया।
समर्थकों का कहना है कि बार-बार चुनाव होने से सरकारी मशीनरी, धन और कर्मचारियों का बड़ा हिस्सा चुनावी कार्यों में लग जाता है। आचार संहिता लागू रहने के कारण विकास कार्य भी प्रभावित हो सकते हैं।
2029 में लागू हुआ तो कई राज्यों का कार्यकाल घटेगा
अगर 2029 में ‘एक देश, एक चुनाव’ लागू किया जाता है, तो कई राज्यों की विधानसभाओं के कार्यकाल में कटौती करनी पड़ सकती है। 2028 में चुनाव वाले मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड और मिजोरम जैसे राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल सामान्य रूप से 2033 तक रहेगा।
वहीं 2027 में चुनाव वाले उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, गोवा, गुजरात, मणिपुर, पंजाब और हिमाचल प्रदेश में भी कार्यकाल समय से पहले समाप्त करना पड़ सकता है। दिल्ली और बिहार में 2025 में चुनाव हुए थे, इसलिए 2029 में चुनाव कराने पर वहां भी करीब एक साल पहले चुनाव कराने की स्थिति बन सकती है।
समर्थकों का दावा है कि इससे चुनावी खर्च घटेगा, प्रशासनिक कार्यक्षमता बढ़ेगी और विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में तेजी आएगी। हालांकि, विपक्ष का सवाल है कि यदि किसी राज्य सरकार का कार्यकाल बीच में ही गिर जाए तो नई व्यवस्था में लोकतांत्रिक प्रक्रिया कैसे संचालित होगी।
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