108 घोड़े, उमड़ा जनसैलाब: सोमनाथ में शौर्य यात्रा में शामिल हुए पीएम मोदी
प्रधानमंत्री मोदी ने सोमनाथ में शौर्य यात्रा में भाग लिया। 108 घोड़े, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और भारी जनसमूह आकर्षण रहे। कार्यक्रम सोमनाथ मंदिर की वीर विरासत को समर्पित रहा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रविवार को गुजरात के सोमनाथ मंदिर में आयोजित ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के तहत भव्य ‘शौर्य यात्रा’ में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने देशभर से आए कलाकारों की सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देखीं और जनसमूह का अभिवादन स्वीकार किया। ‘शौर्य यात्रा’ का आयोजन उन अनगिनत वीर योद्धाओं के सम्मान में किया गया है, जिन्होंने सोमनाथ मंदिर की रक्षा करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए।
भगवान शिव से जुड़े वाद्य ‘डमरू’ की गूंज के बीच जैसे ही प्रधानमंत्री यात्रा में आगे बढ़े, सड़कों के दोनों ओर खड़ी भारी भीड़ ने फूलों की वर्षा कर उनका स्वागत किया। लोग “मोदी-मोदी” के नारों के साथ उत्साह प्रकट करते नजर आए। कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने स्वयं दोनों हाथों में डमरू लेकर उसे बजाया और श्रद्धालुओं का अभिवादन किया।
शौर्य यात्रा में राजस्थान, पंजाब, मणिपुर, गुजरात सहित कई राज्यों से आए कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य और लोक कलाओं की प्रस्तुतियां दीं। कलाकारों ने प्रधानमंत्री मोदी से मिलने पर खुशी जताई। मणिपुर से आए एक कलाकार ने कहा कि सोमनाथ जैसे पवित्र स्थल पर प्रस्तुति देना उनके लिए गर्व का क्षण है। वहीं, पंजाब से आए लोक नर्तकों ने कहा कि प्रधानमंत्री के सामने प्रस्तुति देना उनके जीवन का यादगार पल है।
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इस यात्रा का विशेष आकर्षण 108 घोड़े रहे, जो प्रधानमंत्री के काफिले के साथ चलते हुए नजर आए। इन घोड़ों ने शौर्य और परंपरा के प्रतीक के रूप में यात्रा को और भव्य बना दिया।
शौर्य यात्रा के बाद प्रधानमंत्री सोमनाथ मंदिर में पूजा-अर्चना करेंगे। इसके पश्चात वे साद्भावना मैदान में एक विशाल जनसभा को संबोधित करेंगे। दोपहर में प्रधानमंत्री राजकोट जाएंगे, जहां वे वाइब्रेंट गुजरात क्षेत्रीय सम्मेलन के तहत व्यापार मेले और प्रदर्शनी का उद्घाटन करेंगे। बाद में गांधीनगर में अहमदाबाद मेट्रो रेल परियोजना के फेज-2 मार्ग का शुभारंभ भी करेंगे।
‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ भारत की सभ्यतागत साहस, आध्यात्मिक शक्ति और बार-बार पुनर्निर्माण की परंपरा का प्रतीक है। यह वर्ष सोमनाथ मंदिर के आधुनिक पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी साक्षी है, जिसका उद्घाटन 1951 में राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने किया था।
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