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पाकिस्तान से सीमा-पार आतंकवाद पर सवाल पूछे जाने पर पोलैंड के उप-प्रधानमंत्री मीडिया बातचीत छोड़कर चले गए

पाकिस्तान से सीमा-पार आतंकवाद पर सवाल पूछे जाने पर पोलैंड के उप-प्रधानमंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की मीडिया बातचीत छोड़कर चले गए, जिससे भारत-पोलैंड संबंधों में बढ़ते तनाव के संकेत मिले।

भारत और पोलैंड के संबंधों में हाल के महीनों में बढ़े तनाव की झलक सोमवार को नई दिल्ली में देखने को मिली, जब पोलैंड के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की ने मीडिया के सवाल पर बातचीत अचानक छोड़ दी। यह घटनाक्रम विदेश मंत्री एस. जयशंकर के उस कड़े संदेश के बाद सामने आया, जिसमें उन्होंने पोलैंड से आतंकवाद के प्रति “शून्य सहनशीलता” दिखाने की अपेक्षा जताई थी।

जयशंकर ने इससे पहले सार्वजनिक रूप से कहा था कि पोलैंड को आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख अपनाना चाहिए और भारत के पड़ोस में आतंकवादी ढांचे को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। माना जा रहा है कि यह टिप्पणी अक्टूबर 2025 में इस्लामाबाद यात्रा के दौरान पोलैंड द्वारा कश्मीर पर दिए गए बयान की प्रतिक्रिया थी। जयशंकर ने यह भी खुलासा किया कि उन्होंने न्यूयॉर्क, पेरिस और नई दिल्ली में हुई बैठकों के दौरान सिकोरस्की के सामने भारत का पक्ष स्पष्ट रूप से रखा है और “भारत को चुनिंदा रूप से निशाना बनाना अनुचित और अन्यायपूर्ण” बताया है।

इन बयानों की पृष्ठभूमि में जयशंकर से मुलाकात के बाद सिकोरस्की की मीडिया के साथ संक्षिप्त बातचीत हुई। जब उनसे भारत को चुनिंदा रूप से निशाना बनाए जाने पर सवाल किया गया, तो उन्होंने यूरोप के अनुभव से तुलना करते हुए कहा कि यूरोपीय संघ भी ऐसे अनुभव से गुजरा है।

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हालांकि, इसके बाद सिकोरस्की ने बातचीत का रुख रूस-यूक्रेन युद्ध की ओर मोड़ते हुए भारत से इस संघर्ष को “औपनिवेशिक युद्ध” के रूप में देखने की अपील की। उन्होंने कहा कि रूस यूक्रेन पर नियंत्रण फिर से स्थापित करने की कोशिश कर रहा है, जो अस्वीकार्य है और उपनिवेशवाद का दौर अब खत्म हो चुका है।

लेकिन सबसे असहज क्षण तब आया, जब उनसे पाकिस्तान से होने वाले सीमा-पार आतंकवाद पर भारत की चिंताओं के बारे में पूछा गया। यह वही मुद्दा था, जिस पर जयशंकर ने पोलैंड को चेतावनी दी थी। इस सवाल पर पोलिश विदेश मंत्री असहज और नाराज़ नजर आए और बिना जवाब दिए बातचीत छोड़कर चले गए।

यह घटना भारत-पोलैंड संबंधों में बढ़ती संवेदनशीलता को दर्शाती है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह आतंकवाद और अपनी संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर किसी भी तरह के “चयनात्मक नैतिक उपदेश” को स्वीकार नहीं करेगा।

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