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सुप्रीम कोर्ट ने हैदराबाद की महिला की निवारक हिरासत रद्द की, कहा– केवल ड्रग आरोप से सार्वजनिक व्यवस्था को खतरा नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने हैदराबाद की महिला की निवारक हिरासत रद्द करते हुए कहा कि केवल ड्रग आरोप सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा साबित नहीं होते, इसके लिए ठोस सबूत जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट ने हैदराबाद की एक महिला के खिलाफ जारी निवारक हिरासत आदेश को रद्द करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल मादक पदार्थों से जुड़े आरोप अपने आप में “सार्वजनिक व्यवस्था” के लिए खतरा नहीं माने जा सकते। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार को यह साबित करना होगा कि आरोपी की गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था पर वास्तविक और प्रत्यक्ष खतरा उत्पन्न हो रहा है, जो सामान्य कानून-व्यवस्था के मुद्दों से अलग हो।

न्यायमूर्ति जे. के. महेश्वरी और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदूरकर की खंडपीठ ने 8 जनवरी को दिए गए अपने फैसले में “कानून-व्यवस्था” और “सार्वजनिक व्यवस्था” के बीच सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण अंतर को रेखांकित किया। पीठ ने कहा कि हिरासत आदेश में यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि महिला की कथित गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था किस प्रकार प्रभावित हुई या होने की संभावना थी।

अदालत ने अपने आदेश में कहा, “निवारक हिरासत का सहारा केवल असाधारण परिस्थितियों में लिया जाना चाहिए। राज्य को यह दर्शाना आवश्यक है कि आरोपी के कृत्यों से समाज के सामान्य जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, न कि केवल कुछ व्यक्तियों तक सीमित कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा होती है।”

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यह मामला हैदराबाद की एक महिला से जुड़ा था, जिसे ड्रग से संबंधित मामलों में कथित संलिप्तता के आधार पर निवारक हिरासत में लिया गया था। राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि उसकी गतिविधियां समाज के लिए खतरा हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस दावे के समर्थन में ठोस और विशिष्ट कारणों का अभाव है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निवारक हिरासत जैसे कठोर कानूनों का प्रयोग अत्यंत सावधानी से किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे व्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। इस फैसले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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