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उज्जैन महाकाल मंदिर में वीआईपी दर्शन के खिलाफ याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार

सुप्रीम कोर्ट ने उज्जैन महाकाल मंदिर में वीआईपी दर्शन के खिलाफ याचिका खारिज करते हुए कहा कि मंदिर में प्रवेश तय करना अदालत का नहीं, प्रशासन का विषय है।

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (27 जनवरी 2026) को उज्जैन स्थित प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर मंदिर में ‘वीआईपी दर्शन’ की व्यवस्था के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह यह तय करने की भूमिका में नहीं हैं कि मंदिर में कौन प्रवेश करे और कब करे।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्य कांत ने याचिकाकर्ता दर्पण अवस्थी की ओर से पेश अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन से कहा, “महाकाल के सामने कोई भी वीआईपी नहीं होता।” याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया था कि मंदिर में दर्शन, विशेषकर गर्भगृह (गर्भ-गृह) में प्रवेश को लेकर एक समान और स्पष्ट नीति होनी चाहिए।

इस पर CJI ने कहा कि यह निर्णय प्रशासन और मंदिर प्रबंधन का विषय है, न कि अदालत का। “हम केवल न्यायिक समीक्षा (जस्टिसिएबिलिटी) तक सीमित हैं। अदालत यह तय नहीं कर सकती कि किसे कब और कैसे प्रवेश दिया जाए”।

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दर्पण अवस्थी ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। हाईकोर्ट ने वीआईपी श्रद्धालुओं को गर्भगृह में जल अर्पित करने की अनुमति और आम लोगों को इससे वंचित रखने के मुद्दे पर हस्तक्षेप से इनकार किया था। याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि इससे नागरिकों के बीच भेदभाव होता है और कुछ लोग कलेक्टर के आदेश पर गर्भगृह में प्रवेश कर रहे हैं।

इस पर CJI ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि हर कोई यह मांग करने लगे कि वह भी वही करे जो कोई और कर रहा है, तो अधिकारों की सीमा तय करना कठिन हो जाएगा। इसके बाद अदालत ने याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी।

एक अन्य मामले में, मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी कहा कि जिन मंदिरों में प्रबंधन के लिए सीमित सरकारी हस्तक्षेप है, वहां श्रद्धालुओं के लिए सुविधाओं और सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार देखने को मिला है। यह टिप्पणी कर्नाटक के कोप्पल जिले में स्थित अंजनाद्रि पहाड़ियों पर अंजनेय (हनुमान) मंदिर से जुड़े एक मामले के दौरान की गई।

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