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तस्लीमा नसरीन की कोलकाता वापसी पर बंगाल में सियासी घमासान, बीजेपी ने किया स्वागत तो टीएमसी ने जताई आपत्ति

बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन करीब दो दशक बाद कोलकाता लौट रही हैं। उनकी यात्रा को लेकर पश्चिम बंगाल में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं पर राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है।

बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका और मानवाधिकार कार्यकर्ता तस्लीमा नसरीन करीब दो दशक बाद कोलकाता लौटने वाली हैं। उनकी प्रस्तावित यात्रा ने पश्चिम बंगाल में राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जोड़ते हुए स्वागत किया है, जबकि तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) नेताओं ने इस पर विरोध जताया है।

63 वर्षीय तस्लीमा नसरीन 1 अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित होने वाले कट्टरवाद विरोधी साहित्यिक कार्यक्रम में शामिल होंगी। इस कार्यक्रम ने राज्य में अभिव्यक्ति की आजादी, धर्मनिरपेक्षता और धार्मिक संवेदनशीलता को लेकर पुरानी बहस को फिर से जीवित कर दिया है।

क्यों छोड़ना पड़ा था बांग्लादेश?

तस्लीमा नसरीन 1994 से निर्वासन में रह रही हैं। उनके उपन्यास लज्जा’ के प्रकाशन के बाद बांग्लादेश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे और उनके खिलाफ फतवा जारी किया गया था। अपनी सुरक्षा को देखते हुए उन्हें देश छोड़ना पड़ा। बाद में उन्होंने यूरोप में कई साल बिताए और 2004 में भारत आकर कोलकाता में रहने लगीं।

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उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक द्विखंडितो’ को लेकर भी कोलकाता में विरोध प्रदर्शन हुए थे। उस समय वाम मोर्चा सरकार ने सांप्रदायिक तनाव की आशंका जताते हुए किताब पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालांकि, कलकत्ता हाई कोर्ट ने सितंबर 2005 में इस प्रतिबंध को हटा दिया था।

वापसी पर क्यों छिड़ा विवाद?

तस्लीमा नसरीन ने सोशल मीडिया के जरिए अपनी कोलकाता यात्रा की जानकारी दी। आयोजकों के अनुसार, कार्यक्रम में उनका नागरिक अभिनंदन किया जाएगा और वह कविता पाठ व चर्चा में हिस्सा लेंगी।

बीजेपी नेताओं ने उनकी वापसी का समर्थन करते हुए कहा कि उनकी आवाज को दबाया नहीं जाना चाहिए। राज्य बीजेपी अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा कि तस्लीमा नसरीन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान होना चाहिए।

वहीं, टीएमसी विधायक अखरुज्जमान ने उनकी वापसी पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि तस्लीमा नसरीन ने कई बार मुस्लिम समुदाय के खिलाफ बयान दिए हैं।

इस पूरे मामले ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन को लेकर बहस तेज हो गई है।

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